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हरियाणा का समृद्ध व सांस्कृतिक साहित्य

Kavishala LabsKavishala Labs November 1, 2021
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भारत २८ राज्यों से बना देश है जहाँ हर प्रदेश की अपनी भाषा अपनी संस्कृति है। भाषा और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से सबके अपने महत्त्व व् स्थान हैं। किसी भी भाषा की संस्कृति का आधार उस भाषा के साहित्य से भी कहीं न कहीं जुड़ा होता है जिसे जानने की आवश्यकता होती है। आज के हमारे इस लेख में हम हरयाणवी साहित्य की बात करेंगे। इस साहित्य के साहित्यकारों और उनकी लेखनी से हरयाणा साहित्य के समृद्धि को जानने का प्रयास करेंगे। वैसे तो १ नवम्बर १९६६ को हरयाणा की स्थापना हुई थी जिसे भाषायी आधार पर पूर्वी पंजाब से नये राज्य के रूप में बनाया गया परन्तु इसमें प्राचीन भारत की परंपराओं व लोककथाओं का भंडार है। 



[हिम्मत का हो राम हिमाती, हिम्मत मतना हारै]


हिम्मत का हो राम हिमाती, हिम्मत मतना हारै

मनुष मति मंद तू...टेक


जै तू हिम्मत हार गया तै हिन्दुस्तान गुलाम रहैगा

गोरां के डंडा के नीचै न्यूहै पिटता चाम रहैगा

हिम्मत मतना हारे बहादुर तेरी मदद म्हं राम रहैगा

धरती और आकाश रहेंगे, जब तक तेरा नाम रहैगा

हिम्मत चीज बड़ी सै क्यूं ना भारत ने उभारै

काट दे फंद तू...


हिम्मत की इमदाद करै हर, सुणों खोल कै कान

हिम्मत हारे हर ना मिलते, न्यू कहते भगवान

हिम्मत के कारण सिद्ध होते हिम्मत बिना बिरान

हिम्मत मतना हारे बन्दे, चाहे चली जा जान

हिम्मत करकै नाम रटे जाओ, बिगड़े काम समारै

भज गोबिंद तू...


अंग्रेजां नै मजा चखादे, जयहिन्द की राखै मेर सै तूं

रफल, तोप और तेग चलाणी, जाणै सब हथफेर सै तूं

चुस्त और चालाक बहादुर, पट्टेबाज दिलेर सै तूं

मरणे का क्यूं फिकर करै सै भारत मां का शेर सै तूं

होज्या नै आजाद पड़ा क्यूं पांह पिंजरे मैं मारे

कैद में बंद तू...


सतगुरु मुंशीराम धोरै सिखणा ब्रह्म ज्ञान चाहिए

ढोलक और हरमूनिया बाजा साथ मैं सामान चाहिए

बोस की कहानी का इब करणा तनै बखान चाहिए

हाथ जोड़ कै लैक्चर रसीली सी जबान चाहिए

नेताजी का प्रचार जगत में करणा चाहिए सारै

घूम दयाचन्द तू…

-दयाचंद मायना


दयाचंद मायना हरियाणवी भाषा के प्रसिद्ध कवि थे जो हरियाणा के अब तक के महत्वपूर्ण कवियों और लोकगीत कलाकारों की श्रेणी में विद्यमान हैं। इनका जन्म 10 मार्च 1915 को हरियाणा के रोहतक जिले के मायना गांव में एक वाल्मीकि जाति परिवार में हुआ था। उन्होंने हरियाणवी संग और रागनी का बेहतरीन निर्माण किया, उनके काम ने अपने समय के ब्राह्मणवाद को चुनौती दी। कवी मायने ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर एक नाटक (किस्सा) लिखा था जो बहुत प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने 21 किसास (हरियाणवी में नाटक) और 150 से अधिक रागनिया लिखीं हैं। 20 January 1993 को इस महान कवि का निधन हो गया। 


[लाड करण लगी मात, पूत की कौळी भरकै]


लाड करण लगी मात, पूत की कौळी भरकै


हुई आजादा शोक और भय से, गात म्हं खुशी हो गई ऐसे

जैसे, धन निधरन के लग्या हाथ, खुश हुए न्यौळी भरकै


आज वे परसन्न होगे हरि, आत्मा ठण्डी हुई मेरी

कद तेरी, चढ़ती देखूंगी बारात, बहू आवै रोळी भरकै


तेरे बिन अधम बीच लटकूं थी, नाग जैसे मणि बिन सिर पटकूं थी

पूत बिन भटकूं थी, दिन रात, आया सुख झोळी भरकै


बाजे राम चरण सिर डारै, भवानी सबके कारज सारै

मारै, नुगरयां कै गात, ज्ञान की गोळी भरकै

-बाजे भगत


बाजे भगत एक भारतीय साहित्यकार, कवि, रागनी लेखक, सांग कलाकार और हरियाणवी सांस्कृतिक कलाकार थे। कवि बाजे भगत जी सेन जाति के थे। हरियाणा में सबसे पहले पंडित लख्मीचंद और सेन बाजे भगत कविकार थे ये दोनों ही कवि एक दूसरे का साथ देते थे और सुंदर रागनी गाते थे जो हरयाणवी लोगो के बिच गए जाती हैं। 


[सौदागर तेरै कीड़े पड़ियो दुखिया बीर सताई]


सौदागर तेरै कीड़े पड़ियो दुखिया बीर सताई

बेईमान कै दिन की खातिर ले कै चलल्या बुराई।टेक


कोए कर्म तै राज करै सै कोए दलै सै दाणा

कोए इन हाथां दान करै मोहताज मांग रह्या खाणा

अपणे मतलब का ना होता धन और रूप बिराणा

सोच समझ कै चाल दुष्ट सै धर्मराज घर जाणा

ऊंच नीच का ख्याल नहीं तूं लाग्या करण अंघाई।


पाप धर्म तोलण की खातर धर्मराज घर नरजा

कितै धर्म तुलै कितै पाप तुलै सै न्यारा न्यारा दर्जा

जित धर्म तुलै उड़ै सुरग मिलै तुलै पाप नरक मैं गिरज्या

जै इतनी कहे की भी ना मानै तै नाक डुबो कै मरज्या

मैं लागूं सूं बहाण तेरी तूं मेरा धर्म का भाई।


भले आदमी शुभ कर्मा तै भव सागर तर ज्यांगें

बुरे आदमी बेईमानी मैं सिर बदनामी धर ज्यांगें

भठियारी जै धमका दे सहज बात डर ज्यांगें

दो बालक मेरे याणे याणे रो रो कै मर ज्यांगें

तूं जहाज रोक दे मैं तलै उतरज्यां बहुत घणी दुःख पाई।


ढके ढकाए ढोल म्हारे ये नहीं उघड़ने चाहिए

बीर मर्द म्हारे दोनूं बेटे नहीं बिछड़ने चाहिए

पतिभ्रता के बोल क्रोध के पार लिकड़ने चाहिए

भठियारी कै और तेरै पापी कीड़े पड़ने चाहिए

मेहर सिंह कैह चुपका होज्या मरले परै कसाई।

-शहीद कवि मेहर सिंह


शहीद कवि मेहर सिंह दहिया जिन्हें आमतौर पर फौजी मेहर सिंह और जाट मेहर सिंह के नाम से जाना जाता है, एक प्रसिद्ध हरियाणवी कवि थे। उनका जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले की खरखोदा तहसील के बरोना गांव में जाटों के दहिया वंश में हुआ था। हरियाणा के अलावा दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में आज भी उनकी रागनी लोकप्रिय है।


[इस भारत म्हं दुनिया तै एक ढंग देख लिया न्यारा]


इस भारत म्हं दुनिया तै एक ढंग देख लिया न्यारा

खाज्या घणा कबज होग्या एक भूखा मरै बेचारा


एक जणे की चढ़ी किराये कई कई बिल्डिंग कोठी

एक जणे नै मिलै रहण अनै कोन्या एक तमोटी

एक जणे की खा खा मेर्वे हुई दूंदड़ी मोटी

एक जणे नै पेट भराई कोन्या मिलती रोटी

एक जणा बैठा गद्दी पर दे रहा एक सहारा


एक जणे कै दस दस नौकर सब पर हुक्म चलाता

एक जणे नै नौकर भी कोय घर मैं न नहीं लगाता

एक जणा न्हा धोके सिर म्हं इतर फलेल लगाता

एक जणे नै न्हाणे नै भी नीर मिलै ना ताता

एक फिरै कारां म्हं दूजा भटकै मारा मारा


एक जणा दे खर्च लाख पर करता नहीं पढ़ाई

एक जणा पढ़णा चाहवै पर फीस किते ना थ्याई

एक जणे कै बीस वर्ष में दो दो तीन लुगाई

एक जणे की उमर बीत गई कोन्या हुई सगाई

दस पोशाक एक पै दूजा नांगा करै गुजारा


एक जणे के घर म्हं आवै अन्धा धुन्ध कमाई

एक जणे के घर म्हं कोन्या जहर खाण नै पाई

एक जणे कै बीस आदमी करते मन की चाहे

एक जणे के घर म्हं कोन्या बतळावन नै भाई

“ज्ञानी राम” पता ना कद यू फर्क मिटैगा म्हारा।।

-ज्ञानी राम शास्त्री


ज्ञानी राम शास्त्री हरियाणा के प्रसिद्ध कवियों में एक थे जिनका जन्म १९२३ जींद ,हरियाणा में हुआ था। पाकिस्तान की पोल, नया जमाना, बखत के बोल, ज्ञान के हीरे मोती, वक्त की आवाज उनकी कुछ मुख्य कृतियाँ हैं। 


[अरे ज्ञान बिना संसार दुखी, ज्ञान बिना दुःख सुख खेणा]


अरे ज्ञान बिना संसार दुखी, ज्ञान बिना दुःख सुख खेणा,

ज्ञान से ऋषि तपस्या करते, जो तुझको पड़ा पड़ा सहणा!

ज्ञान से कार व्यवहार चालते, साहूकार से ऋण लेना!

ज्ञान से प्रजा का पालन करके, ब्याज मूल सब दे देना!

अरे ले कर्जा कोए मार किसे का, जो रहती ये सच्ची शान नही!

अधर्म करके जीना...


एक सत्यकाम ने गुरु की गउओं को इतने दिन तक चरा दिया,

जहाँ गई वो साथ गया, उसने प्रेम से उदर भरा दिया!

सत्यकाम ने गुरु के वचन को धर्मनाव पर तिरा दिया,

फ़िर से बात सुनी सांड की यम् का दर्शन करा दिया!

ज्ञानी पुरूष कोण कहे, पशुओं में भी भगवान् नही !

अधर्म करके जीना...

होए ज्ञान के कारण पृथ्वी, जल, वायु, तेज, आकाश खड़े:

ज्ञान के कारण सो कोस परे, ज्ञान के कारण पास खड़े!

मुझ को मोक्ष मिले होण ने, न्यू करके पूरी आस खड़े

जान जाओ पर रहो धर्म पे, इस देह का मान गुमान नही!

अधर्म करके जीना...


फेर अंत में क्या कहती है भला:

ज्ञान बिना मेरी टांग टूटगी, ज्ञान बिना कूदी खाई!

ज्ञान बिना में लंगडी होगी, ज्ञान बिना बुड्ढी ब्याई!

ज्ञान बिना तू मुझको खाता, कुछ मन में ध्यान करो भाई!

लख्मीचंद कह क्यों भूल गए सब, धर्म शरण की यो राही!

इस निराकार का बच्चा बन ज्या, क्यों कह मेरे में भगवान् नही!

अधर्म करके जीना चाहता, राजधर्म का ध्यान नही!

मोंत भूख का एक पिता है, फ़िर तुझे कैसे ज्ञान नही

अधर्म करके जीना चाहता, राज धर्म का ध्यान नही

-लखमी चंद


पंडित लखमी चंद हरियाणवी भाषा के एक प्रसिद्ध कवि व लोक कलाकार थे। हरियाणवी रागनी व सांग में उनके उल्लेखनीय योगदान के कारण उन्हें "सूर्य-कवि" कहा जाता है इसके अलावा उन्हें "हरियाणा का कालिदास" भी कहा जाता है। उनका जन्म सोनीपत जिले के जाट्टी कलां गाँव में एक साधारण किसान गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था तथा मात्र ४२ वर्ष की आयु में ही वे चल बसे। उनके नाम पर साहित्य के क्षेत्र में कई पुरस्कार दिए जाते हैं।

उनके द्वारा रचित कुछ प्रमुख सांग हैं : नल-दमयंती, मीराबाई, सत्यवान सावित्री, सेठ तारा चंद, पूरन भगत व शाही लकड़हारा आदि। 



[गुलिस्तान की छवि कहैं, क्या ऐसा आलीशान बण्या]


गुलिस्तान की छवि कहैं, क्या ऐसा आलीशान बण्या,

सुरपति का आराम कहैं, या मनसिज का अस्थान बण्या ।। टेक ।।


दाड़िम, दाख, छुहारे न्यारे, पिस्ते और बदाम लगे,

मोगरा, केवड़ा, हिना, चमेली, खुशबूदार तमाम लगे,

अखरोट, श्रीफल, चिलगोजे, कदली, अंगूर मुलाम लगे,

नींबू, नारंगी, चंगी, अमरूद, सन्तरे, आम लगे,

जूही, बेला, पुष्प, गुलाब खिल्या, एक आत्म परम स्थान बण्या।।


मौलसरी, चंपा लजवंती, लहर-लहर लहराई थी,

केतकी, सूरजमुखी, गेंदे की, महक चमन मै छाई थी,

स्फटिक मणी दीवारों पै, संगमरमर की खाई थी,

गुलिस्तान की शोभा लख, बसंत ऋतु शरमाई थी,

बाग कहुं या स्वर्ग, इस चिंता मै कफगान बण्या।।


मलयागर चंदन के बिरवे, केसर की क्यारी देखी,

बाग बहोत से देखे थे, पर या शोभा न्यारी देखी,

जिधर नजर जा वहीं अटकज्या, सब वस्तु प्यारी देखी,

सितम करे कारीगर नै, अद्भुत होशियारी देखी,

अमृत सम जल स्वादिष्ट एक तला, चमन दरम्यान बण्या।।


झाड़, फानुस, गिलास लगे, विद्युत की बत्ती चसती थी,

नीलकंठ, कलकंठ, मधुर सुर, प्रिय वाणी दसती थी,

मुकुर बीच तस्वीर खींची, तिरछी चितवन मन हंसती थी,

अष्ट सिद्धी, नव निधि, जाणु तो गुलिस्तान मै बसती थी,

हीरे, मोती, लाल लगे, एक देखण योग्य मकान बण्या।।


शीशे की अलमारी भेद बिन, चाबी लगै ना ताळे मै,

कंघा, सीसा, शीशी इत्र की, पान दान धरे आळे मै,

चमकैं धरे गिलास काँच के, जैसे बर्फ हिमाळय मै,

एक जबरा पेड़ खड़्या था बड़ का, झूल घली थी डाळे मै,

परी अर्श से आती होगी, इस तरीयां का मिजान बण्या।।


चातक, चकवा, चकोर, बुलबुल, मैना, मोर, मराल रहैं,

सेढू, लक्ष्मण, शंकरदास के, परम गुरु गोपाल रहैं,

केशोराम सैल करते, खिदमत मैं कुंदनलाल रहैं,

कर नंदलाल प्रेम से सेवा, तुम पै गुरु दयाल रहैं,

मन मतंग को वश मै कर, ईश्वर का नाम ऐलान बण्या।।

-पंडित नंदलाल शर्मा


पंडित नंदलाल शर्मा का जन्म २९ अक्टुबर १९१३ को हरियाणा के छोटे से गाँव पात्थरवाली में हुआ।उनके पिता का नाम पंडित केशोराम जी और माता का नाम श्री मति श्योकोरी देवी था।

केशोराम जी बहुत बड़े कवि व लोक गायक थे।नंदलाल जी की गायन के प्रति रुचि बहुत छोटी सी उम्र में हो गयी थी।उन्होनें अपने बड़े भाई श्री कुंदनलाल जी को गुरु के रूप में अपनाया और उनसे गायन विधा के गुण ग्रहण किए।


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