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महाकवि विद्यापति - 'श्रृंगार-परम्परा' और 'भक्ति-परम्परा' के प्रमुख स्तम्भ।

Kavishala LabsKavishala Labs October 21, 2021
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कत न वेदन मोहि देसि मरदाना।

हट नहिं बला, मोहि जुबति जना।

भनई विद्यापति, तनु देव कामा।

एक भए दूखन नाम मोरा बामा।

गिरिवर गरुअपयोधर परसित।

गिय गय मौतिक हारा।

काम कम्बु भरि कनक संभुपरि।

-विद्यापति


मैथिल कवि कोकिल के नाम से जाने जाने वाले मैथिली के सर्वोप्रिय कवि जिन्होंने श्रृंगार-परंपरा के साथ-साथ भक्ति परंपरा को अपनी लेखनी में उतारा कवि विद्यापति की रचनाओं में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरुप का रूपांतरण देखने को मिलता है। विद्यापति को ही बंगाली साहित्य के जनक का दर्जा भी प्राप्त है। महाकवि विद्यापति को वैष्णव , शैव और शाक्त भक्ति के सेतु के रूप में भी स्वीकार किया गया है। मिथिला के लोगों को 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' का सूत्र दे कर इन्होंने उत्तरी-बिहार में लोकभाषा की जनचेतना को जीवित करने का महान् प्रयास किया है। मैथिलि लोकगीतों में उनके गीतों और भजनो का सबसे ज़्यादा प्रयोग किया जाता है। श्रृंगार रस और भक्ति रस में भीगी उनकी कृतियां मैथिली संस्कृति में जीवित हैं। विद्यापति का जन्म उत्तरी बिहार के मिथिला क्षेत्र के वर्तमान मधुबनी जिला के विस्फी गाँव में एक शैव ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वहीं उनके स्वयं के कार्यों और उनके संरक्षकों की परस्पर विरोधी जानकारी के कारण उनकी सही जन्म तिथि के बारे में भ्रम है। बात करें उनके पिता की तो उनके पिता का नाम गणपति ठाकुर था जो एक मैथिल ब्राह्मण थे जिसे शिव का बहुत बड़ा भक्त कहा जाता है। वह तिरहुत के शासक राजा गणेश्वर के दरबार में एक पुरोहित थें। उनके परदादा देवादित्य ठाकुर सहित उनके कई निकट पूर्वज अपने आप में उल्लेखनीय थे, जो हरिसिंह देव के दरबार में युद्ध और शान्ति मंत्री थे।

मैथिली साहित्य के साथ-साथ उन्होंने उड़िया साहित्य और बंगाली साहित्य पर भी उनका बहुत प्रभाव रहा।


उड़िया साहित्य : विद्यापति का प्रभाव ओडिशा, बंगाल से होते हुए पहुंचा। ब्रजबोली में सबसे प्रारंभिक रचना, विद्यापति द्वारा लोकप्रिय एक कृत्रिम साहित्यिक भाषा, रामानंदा राय, ओडिशा के राजा, गजपति प्रतापरुद्र देव के गोदावरी प्रांत के राज्यपाल के रूप में वर्णित है। वह चैतन्य महाप्रभु के शिष्य थे। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु को अपनी ब्रजबोली कविताओं का पाठ किया, जब वे पहली बार उनसे गोदावरी नदी के किनारे राजमुंदरी में मिले, जो कि १५११-१२ में ओडिशा राज्य की दक्षिणी प्रांतीय राजधानी थी। अन्य उल्लेखनीय ओडिया साहित्य विद्यापति की कविताओं से प्रभावित कवि चंपति राय और राजा प्रताप मल्ल देव (1504–32) थे।


बंगाली साहित्य-

बंगाली वैष्णव जैसे चैतन्य और चंडीदास ने वैष्णव भजनों के रूप में राधा और कृष्ण के बारे में विद्यापति के प्रेम गीतों को अपनाया। मध्यकाल के सभी प्रमुख बंगाली कवि विद्यापति से प्रभावित थे। नतीजतन, एक कृत्रिम साहित्यिक भाषा, जिसे ब्रजबोली के रूप में जाना जाता है, सोलहवीं शताब्दी में विकसित की गई थी। ब्रजबोली मूल रूप से मैथिली है (जैसा कि मध्ययुगीन काल के दौरान प्रचलित था) लेकिन इसके रूपों को बंगाली की तरह दिखने के लिए संशोधित किया गया है। मध्यकालीन बंगाली कवियों, गोबिंददास कबीरराज, ज्ञानदास, बलरामदास और नरोत्तमदास ने इस भाषा में अपने 'पाद' (कविता) की रचना की। 


विद्यापति मुख्य रूप से भक्ति रस और श्रृंगार रस के कवि थे उन्होंने राधा और कृष्ण के प्रेम पर सैकड़ों प्रेम गीत लिखे, लेकिन वे कृष्ण या विष्णु के विशेष भक्त नहीं थें। इसके बजाय, उन्होंने शिव और दुर्गा पर ध्यान आकर्षित किया, लेकिन विष्णु और गंगा के बारे में गीत भी लिखे। वह विशेष रूप से शिव और पार्वती के प्रेम गीतों और सर्वोच्च ब्राह्मण के रूप में शिव के लिए प्रार्थना के लिए जाने जाते हैं।


चलिए पढ़तें हैं विद्यापति द्वारा रचित कुछ रचनाओं को :


[एत जप-तप हम की लागि कयलहु]


एत जप-तप हम की लागि कयलहु

कथि लय कयल नित दान।

हमर धिया के इहो वर होयताह,

आब नहिं रहत परान।

नहिं छनि हर कें माय-बाप,

नहिं छनि सोदर भाय।

मोर धिया जओं ससुर जयती,

बइसती ककरा लग जाय।

घास काटि लऔती बसहा च्रौरती,

कुटती भांग–धथूर।

एको पल गौरी बैसहु न पौती,

रहती ठाढि हजूर।

भनहि विद्यापति सुनु हे मनाइनि,

दिढ़ करू अपन गेआन।

तीन लोक केर एहो छथि ठाकुर

गौरा देवी जान।


इस कविता में शिव विवाह के दृश्य को दर्शाया गया है जब शिव को वर के रूप में देख कर माता को यह चिंता सता रही है कि ससुराल में पार्वती किसके साथ रहेगी क्यूंकि उनके ससुराल में -न सास है, न ससुर , कैसे उसका निर्वाह होगा ? सारा जप –तप उसका निरर्थक हो गया। 


[रुसि चलली भवानी तेजि महेस]


रुसि चलली भवानी तेजि महेस

कर धय कार्तिक कोर गनेस


तोहे गउरी जनु नैहर जाह

त्रिशुल बघम्बर बेचि बरु खाह


त्रिशुल बघम्बर रहओ बरपाय

हमे दुःख काटब नैहर जाए


देखि अयलहुं गउरी, नैहर तोर

सब कां पहिरन बाकल डोर


जनु उकटी सिव, नैहर मोर

नाँगट सओं भल बाकल-डोर


भनइ विद्यापति सुनिअ महेस

नीलकंठ भए हरिअ कलेश


प्रस्तुत रचना में कवि ने गौरी के रूठ जाने का वर्णन प्रस्तुत किया है जब शिव से रूत कर गौरी कार्तिक का हाथ पकड़ लेती हैं और गणेश को गोद में लेकर विदा ले लेती हैं ,जिसपर शिव जी आग्रह करते हुए कहते हैं - हे गौरी, आप नैहर (मायके) न जाएँ और उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं। 

[कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ]

कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ।

दुखहि जनम भेल दुखहि गमाओल

सुख सपनहु नहि भेल हे भोला।

एहि भव सागर थाह कतहु नहि

भैरव धरु करुआर ;हे भोलानाथ।

भन विद्यापति मोर भोलानाथ गति

देहु अभय बर मोहि, हे भोलानाथ।


प्रस्तुत कविता में महाकवि विद्यापति ने बोलेनाथ से करुणा स्वर में पूछा रहे हैं कि वे कब उनका दुःख हरेंगे। ये जीवन जैसा भव सागर कई नहीं हैं मेरे दुःख को हरिये भोलेनाथ। 



विद्यापति ने विरह गीतों को भी लिखा जिनमे से एक की प्रस्तुति आपके समक्ष प्रस्तुत है। 


[सखी हम जीबन कोना कटबई]


सखी हम जीबन कोना कटबई

अयलाह से काल्हिये जेताह

नै साहब कान्हि सँ टिकुली

नै पहिरब चुड़ी ने बिजली

भमर सन केस अछि हमरो

सेहो बिनु तेल के रखबई

सखी हम जीबन कोना कटबई

अयलाह से काल्हिये जेताह

जहन चल अंग मे भुषण

तहन भ हम लेपबई

चमेली तेल के बदला

रुक्ख भ हम लेपबई

जखन अंगुली के आठो पर

गनै छलियई पीया अपोता

तहन माला के गोरी पर

पीया के नाम हम रटबई

जहन दिन-राति पलंगिया पर

पीया संग केलि हम केलयै

तहन बीरहा के बेदन में

पीया के नाम हम रटबई

सखी हम जीबन कोना कटबई

अयलाहे हो काल्हिये जेताह


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