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लोकनायक जयप्रकाश नारायण-एक परिचय!

Kavishala LabsKavishala Labs October 8, 2021
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“भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रान्ति लाना आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं; क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति-’सम्पूर्ण क्रान्ति’ आवश्यक है”


-जयप्रकाश नारायण


अपना सम्पूर्ण जीवन भारतीय समाज की समस्याओं को हल करने में बिता देने वाले जयप्रकाश का जन्म 11 अक्तूबर, 1902 ई. में सिताबदियारा बिहार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री 'देवकी बाबू' और माता का नाम 'फूलरानी देवी' थीं। वे एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं राजनेता थे जिन्हे मुख्या रूप से भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रागाँधी के विरूद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है।वे इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध थे। वे एक समाज सेवी थे लोगो के लिए कार्य करना ही अपना संकल्प मानते थे ,इसलिए वे जनता के बिच लोकनायक के नाम से जाने जाने लगे थे।आपको बता दें १९९८ में मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें समाजसेवा के लिए १९६५ में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। वहीँ दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल लोक नायक अस्पताल उन्ही के नाम पर रखा गया है साथ ही पटना का हवाई अड्डा भी उन्ही के नाम पर है। जयप्रकाश अपने छात्र जीवन में ही स्वतंत्र संग्राम का हिस्सा बन गए थे वही 1922 में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गये, जहाँ उन्होंने 1922-1929 के बीच कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय-बरकली, विसकांसन विश्वविद्यालय में समाज-शास्त्र का अध्ययन किया।


वापिस आने पर उन्होंने दुबारा स्वतंत्र संग्राम में अपनी भागीदारी दी। 1939 में उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आन्दोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के अभियान चलाये। टाटा स्टील कम्पनी में हड़ताल कराके यह प्रयास किया कि अंग्रेज़ों को इस्पात न पहुँचे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महीने की कैद की सज़ा सुनाई गयी। जेल से छूटने के बाद उन्होंने गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच सुलह का प्रयास किया। उन्हें बन्दी बनाकर मुम्बई की आर्थर जेल और दिल्ली की कैम्प जेल में रखा गया। 1942 भारत छोडो आन्दोलन के दौरान वे आर्थर जेल से फरार हो गये।


गांधी और जवाहर लाल नेहरू के साथ उन्होंने देश को आज़ाद करने के संघर्षो में अपना योगदान दिया हांलाकि वे हथियारों का प्रयोग को सही मानते थे अतः गाँधी के अहिंसा के व्रत को नहीं बल्कि हिंसा का सहारा उनके लिए ज़्यादा सही था। उन्होंने नेपाल जाकर आज़ाद दस्ते का गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया।1948 में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिलकर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की।19 अप्रील, 1954 में गया, बिहार में उन्होंने विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन के लिए जीवन समर्पित करने की घोषणा की। वहीँ 3 वर्ष बाद 1957 में उन्होंने लोकनीति के पक्ष में राजनीति छोड़ने का निर्णय लियाआज ही की तारीख 8 अक्टूबर 1979 को हृदय की बीमारी और मधुमेह के कारण जयप्रकाश नारायण का निधन उनके निवास स्थान पटना में हुआ। उनके सम्मान में तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने ७ दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की थी, उनके सम्मान में कई हजार लोग उनकी शोक यात्रा में शामिल हुए।


अपनी आवाज को भाषणों के साथ वे कविताओं और पुस्तकों के सहारे भी ऊँची करते थे उन्होंने कई आंदोलन कवितायेँ लिखी जिसने लोगो के भीतर देश प्रेम की भावना को और बुलंद करने का कार्य किया। जेपी ने 1950 के दशक में ‘राज्यव्यवस्था की पुनर्रचना’ नामक एक पुस्तक लिखी। कहा जाता है कि इसी पुस्तक को आधार बनाकर नेहरू ने ‘मेहता आयोग’ का गठन किया।




जेपी द्वारा लिखी एक कविता आपके समक्ष उपस्थित है:


जीवन विफलताओं से भरा है,

सफलताएँ जब कभी आईं निकट,

दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से

तो क्या वह मूर्खता थी ?

नहीं


सफलता और विफलता की

परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !


इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व

बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?

किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए

कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,

पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,

पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के.


जग जिन्हें कहता विफलता

थीं शोध की वे मंज़िलें.


मंजिलें वे अनगिनत हैं,

गन्तव्य भी अति दूर है,

रुकना नहीं मुझको कहीं

अवरुद्ध जितना मार्ग हो

निज कामना कुछ है नहीं

सब है समर्पित ईश को


तो, विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,

और यह विफल जीवन

शत–शत धन्य होगा,

यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का

कण्टकाकीर्ण मार्ग

यह कुछ सुगम बन जावे!


-जयप्रकाश नारायण


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