कविताओं में जलते दीप।'s image
Article8 min read

कविताओं में जलते दीप।

Kavishala LabsKavishala Labs November 3, 2021
Share0 Bookmarks 280 Reads1 Likes

दीपमाला में मुसर्रत की खनक शामिल है

दीप की लौ में खिले गुल की चमक शामिल है

जश्न में डूबी बहारों का ये तोहफ़ा शाहिद

जगमगाहट में भी फूलों की महक शामिल है

-शाहिद मिर्ज़ा शाहिद


सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण दिवाली के इस पर्व में पूरा देश दिये की रौशनी से जगमगा रहा है। तो चलिए इस शुभ पर्व में हिंदी कवियों की प्रसिद्ध कविताओं में जलते दीपावली के दीपकों को शब्दों के माध्यम से पढ़ते हैं :

[जब प्रेम के दीपक जलते हों]


उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है ।

जब मन में हो मौज बहारों की,

चमकाएँ चमक सितारों की,

जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों

तन्हाई में भी मेले हों,

आनंद की आभा होती है,

उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है ।


जब प्रेम के दीपक जलते हों

सपने जब सच में बदलते हों,

मन में हो मधुरता भावों की

जब लहके फ़सलें चावों की,

उत्साह की आभा होती है

उस रोज़ दिवाली होती है ।


जब प्रेम से मीत बुलाते हों

दुश्मन भी गले लगाते हों,

जब कहींं किसी से वैर न हो

सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,

अपनत्व की आभा होती है

उस रोज़ दिवाली होती है ।


जब तन-मन-जीवन सज जाएं

सद्-भाव के बाजे बज जाएं,

महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की

मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,

तृप्ति की आभा होती है

उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है।

– अटल बिहारी वाजपेयी


[मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!]


मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!

युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल

प्रियतम का पथ आलोकित कर!


सौरभ फैला विपुल धूप बन

मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन!

दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,

तेरे जीवन का अणु गल-गल

पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!


तारे शीतल कोमल नूतन

माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;

विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं

हाय, न जल पाया तुझमें मिल!

सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!


जलते नभ में देख असंख्यक

स्नेह-हीन नित कितने दीपक

जलमय सागर का उर जलता;

विद्युत ले घिरता है बादल!

विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!


द्रुम के अंग हरित कोमलतम

ज्वाला को करते हृदयंगम

वसुधा के जड़ अन्तर में भी

बन्दी है तापों की हलचल;

बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!


मेरे निस्वासों से द्रुततर,

सुभग न तू बुझने का भय कर।

मैं अंचल की ओट किये हूँ!

अपनी मृदु पलकों से चंचल

सहज-सहज मेरे दीपक जल!


सीमा ही लघुता का बन्धन

है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन

मैं दृग के अक्षय कोषों से-

तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!

सहज-सहज मेरे दीपक जल!


तुम असीम तेरा प्रकाश चिर

खेलेंगे नव खेल निरन्तर,

तम के अणु-अणु में विद्युत-सा

अमिट चित्र अंकित करता चल,

सरल-सरल मेरे दीपक जल!


तू जल-जल जितना होता क्षय;

यह समीप आता छलनामय;

मधुर मिलन में मिट जाना तू

उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल!

मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!

प्रियतम का पथ आलोकित कर!

-महादेवी वर्मा


[दिवाली रोज मनाएं]


दिवाली रोज मनाएं

फूलझड़ी फूल बिखेरेचकरी चक्कर खाए

अनार उछला आसमान तक

रस्सी-बम धमकाए

सांप की गोली हो गई लम्बी

रेल धागे पर दौड़ लगाएआग लगाओ रॉकेट को तो

वो दुनिया नाप आए

टिकड़ी के संग छोटे-मोटेबम बच्चों को भाए

ऐसा लगता है दिवाली

हम तुम रोज मनाएं।

– संदीप फाफरिया ‘सृजन’


[बचपन बाली दीवाली]


हफ्तों पहले से साफ़-सफाई में जुट जाते हैं।

चूने के कनिस्तर में थोड़ी नील मिलाते हैं।

अलमारी खिसका खोयी चीज़ वापस पाते हैं।

दोछत्ती का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं ।

चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ….।

दौड़-भाग के घर का हर सामान लाते हैं ।

चवन्नी -अठन्नी पटाखों के लिए बचाते हैं।

सजी बाज़ार की रौनक देखने जाते हैं।

सिर्फ दाम पूछने के लिए चीजों को उठाते हैं।

चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ….।

बिजली की झालर छत से लटकाते हैं।

कुछ में मास्टर बल्ब भी लगाते हैं।

टेस्टर लिए पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते हैं।

दो-चार बिजली के झटके भी खाते हैं।

चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ….।

दूर थोक की दुकान से पटाखे लाते है।

मुर्गा ब्रांड हर पैकेट में खोजते जाते है।

दो दिन तक उन्हें छत की धूप में सुखाते हैं।

बार-बार बस गिनते जाते है।

चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ….।

धनतेरस के दिन कटोरदान लाते है।

छत के जंगले से कंडील लटकाते हैं।

मिठाई के ऊपर लगे काजू-बादाम खाते हैं।

प्रसाद की थाली पड़ोस में देने जाते हैं।

चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ….।


माँ से खील में से धान बिनवाते हैं ।

खांड के खिलोने के साथ उसे जमके खाते है।

अन्नकूट के लिए सब्जियों का ढेर लगाते है ।

भैया-दूज के दिन दीदी से आशीर्वाद पाते हैं ।

चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ….।

दिवाली बीत जाने पे दुखी हो जाते हैं।

कुछ न फूटे पटाखों का बारूद जलाते हैं ।

घर की छत पे दगे हुए राकेट पाते हैं ।

बुझे दीयों को मुंडेर से हटाते हैं ।

चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ….।

बूढ़े माँ-बाप का एकाकीपन मिटाते हैं ।

वहीँ पुरानी रौनक फिर से लाते हैं।

सामान से नहीं, समय देकर सम्मान जताते हैं।

उनके पुराने सुने किस्से फिर से सुनते जाते हैं ।

चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं …

– गुलज़ार


[दीपों की पंक्ति में हँसती]


दीपों की पंक्ति में हँसती,

दिवाली की रात है आई.


दीपा, राजू ने मिल-जुल कर,

घर, आँगन की करी सफाई.


पूजा की थाली में सजते,

मेवा, कुमकुम, फूल, मिठाई.


फूलझड़ी नाचे मतवाली,

नाचे फिरकी और हवाई.


खिल खिल करते हँसे अनार,

बम्बों ने है धूम मचाई.


पुण्य सदा जीता है जग में,

यही तो है अटल सच्चाई.


प्रेम प्यार का भाव बताती,

दिवाली की रात है आई.

– राजेन्द्र निशेश


[शत-शत दीप इकट्ठे होंगे]


आज देश के ऊपर कैसी

काली रातें आई हैं!

मातम की घनघोर घटाएँ

कैसी जमकर छाई हैं!


लेकिन दृढ़ विश्वास मुझे है

वह भी रातें आएँगी,

जब यह भारतभूमि हमारी

दीपावली मनाएगी!


शत-शत दीप इकट्ठे होंगे

अपनी-अपनी चमक लिए,

अपने-अपने त्याग, तपस्या,

श्रम, संयम की दमक लिए।


अपनी ज्वाला प्रभा परीक्षित

सब दीपक दिखलाएँगे,

सब अपनी प्रतिभा पर पुलकित

लौ को उच्च उठाएँगे।


तब, सब मेरे आस-पास की

दुनिया के सो जाने पर,

भय, आशा, अभिलाषा रंजित

स्वप्नों में खो जाने पर,


जो मेरे पढ़ने-लिखने के

कमरे में जलता दीपक,

उसको होना नहीं पड़ेगा

लज्जित, लांच्छित, नतमस्तक।


क्योंकि इसीके उजियाले में

बैठ लिखे हैं मैंने गान,

जिनको सुख-दुख में गाएगी

भारत की भावी संतान!

-हरिवंशराय बच्चन


[साथी, घर-घर आज दिवाली]


साथी, घर-घर आज दिवाली!

फैल गयी दीपों की माला

मंदिर-मंदिर में उजियाला,

किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली!

साथी, घर-घर आज दिवाली!

हास उमंग हृदय में भर-भर

घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर,

किंतु हमारे घर के अंदर डरा हुआ सूनापन खाली!

साथी, घर-घर आज दिवाली!

आँख हमारी नभ-मंडल पर,

वही हमारा नीलम का घर,

दीप मालिका मना रही है रात हमारी तारोंवाली!

साथी, घर-घर आज दिवाली!

– हरिवंशराय बच्चन


[जगमग सबकी मने दिवाली]


जगमग सबकी मने दिवाली,

खुशी उछालें भर-भर थाली।

खील खिलौने और बताशे,

खूब बजाएं बाजे ताशे।

ज्योति-पर्व है,ज्योति जलाएं,

मन के तम को दूर भगाएं।

दीप जलाएं सबके घर पर,

जो नम आँखें उनके घर पर।

हर मन में जब दीप जलेगा,

तभी दिवाली पर्व मनेगा।

खुशियाँ सबके घर-घर बाँटें,

तिमिर कुहासा मन का छाँटें।

धूम धड़ाका खुशी मनाएं,

सभी जगह पर दीप जलाएं।

कोई कोना ऐसा हो ना,

जिसमें जलता दीप दिखे ना।

देखो, ऊपर नभ में थाली,

चन्दा के घर मनी दिवाली।

देखो, ढ़ेरों दीप जले हैं,

नहीं पटाखे वहाँ चले हैं।

कैसी सुन्दर हवा वहाँ है,

बोलो कैसी हवा यहाँ है।

सुनो, पटाखे नहीं चलाएं,

धुआँ, धुन्ध से मुक्ति पाए।

– आनन्द विश्वास




No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts