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मैंने तय किया- परसाई, डरो किसी से मत

Kavishala LabsKavishala Labs October 25, 2021
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मैंने तय किया- परसाई, डरो किसी से मत डरे कि मरे, सीने को ऊपर कड़ा कर लो, भीतर तुम जो भी हो. ज़िम्मेदारी को गैर ज़िम्मेदारी के साथ निभाओ

-हरिशंकर परसाई


व्यंग शब्द सुनते ही सबसे पहले जिसका नाम स्मरण होता है वो हैं हरिशंकर परसाई का जो स्वयं कहा करते थे कि व्यंग्य साहित्य की एक ऐसी विधि है जो जीवन की आलोचना करता है और मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है। एक व्यंगकार ,व्यक्ति-जीवन की विडम्बनाओं का एक ऐसा रेखाचित्र खींचता है जिसे पढ़ने वाला पाठक स्वयं ही सवाल उठाने को विवश हो जाता है। आज इस लेख में हम बात करेंगे व्यंग्य सम्राट हरिशंकर प्रसाद जी की जो समाज की रग रग से वाकिफ वयंकार थे। अपनी रचनाओं से उन्होंने सामाज में पसरी विसंगतिओं पाखंडों और मिथ्याचारों पर खुल कर प्रहार किया। सही मायनों में व्यंग्य की इस विधा की नीव रखने के साथ साथ सुढृढ़ रूप से खड़ा करने में परसाई जी ने मुख्य भूमिका निभाई है।जातीयता ,धार्मिक रूढ़िवादिता ,धार्मिक कट्टरता के विरूद्ध उनका एक अपना अलग विरोधी तेवर नज़र पड़ता था जिसका श्रेय वे अपनी बुआ को दिया करते थे आपको बता दें बचपन में ही परसाई जी की माँ का निधन हो गया था जिसके बाद उनकी बुआ उनके बहुत निकट थी। उनकी बुआ का प्रभाव उनके जीवन में बहुत पड़ा । उनसे ही उन्होंने सीखा कि जातीयता और धर्म बेकार के ढकोसले हैं। स्वयं उनकी बुआ ने पचास साल की अवस्था में तमाम विरोधों के बावजूद एक अनाथ मुस्लिम लड़के को अपने यहां शरण दे रखी थी। वो कहती थी संकट कोई भी हो घबराना नहीं ,सब हो जाएगा। इसी मूल मंत्र को साथ रख संघर्षो में भी परसाई जी ने स्वयं को हमेशा मजबूत रखा 

मैंने तय किया- परसाई, डरो किसी से मत डरे कि मरेसीने को ऊपर कड़ा कर लो, भीतर तुम जो भी हो ज़िम्मेदारी को गैर ज़िम्मेदारी के साथ निभाओ

परसाई जी ने स्वयं अविवाहित रहते हुए अपने भाई-बहनो की जिम्मेदारी को पूर्ण किया। शायद कार्य के प्रति उनकी निष्ठां ही थी जो उन्हें इस विषम जिंदगी को झेल जाने की शक्ति देती थी।



जिसका वर्णन उनके एक निबंध पहला सफ़ेद बाल में मिलता है जहाँ वे लिखते हैं ‘अपना कोई पुत्र नहीं होता तो मुश्किल में पड़ जाते. क्या देते?… तो इतना रंक नहीं हूं- विराट भविष्य तो है और उत्तराधिकारी की समस्या भी हल हो गई. होने दो हमारे बाल सफ़ेद हम काम में तो लगे हैं- जानते हैं कि काम बंद करने और मरने का क्षण एक ही होता है.’

लेखक कोई भी हो सफल वही है जो उद्देश्य को साथ लेकर लिखता हो समाज की विसंगतियों को उजागर करने का कार्य करना ही उसका कर्त्तव्य हो। लेखक को लेकर हरिशंकर परसाई के विचार भी कुछ ऐसे ही थे। लेखक को लेकर वो कहते हैं :


लेखक समाज का एक अंग है और उस समाज पर जो गुजरती है, उसमें सहभागी है. समाज के उत्थान और पतन, संघर्ष, सुख-दुख, आशा-निराशा, अन्याय-उत्पीड़न आदि में वह दूसरों का सहभोक्ता है’ 


परसाई जी धार्मिक ढकोसलों समाज की विसंगतियों और विरोधभासो को अपने तीखे व्यंगो से परास्त करते थे जहाँ प्रेम विवाहों और अंतर्जातीय विवाहों के सन्दर्भ में परसाई अपने एक परिचित की मान्यताओं में उत्तर लिखते हैं :


‘भगवान अगर औरत भगाये तो वह बात भजन में आ जाती है. साधारण आदमी ऐसा करे तो यह काम अनैतिक हो जाता है जिस लड़की की आप चर्चा कर रहे हैं, वह अपनी मर्ज़ी से घर से निकल गई और मर्ज़ी से शादी कर ली, इसमें क्या हो गया?आगे, परिचित महोदय कहते हैं: आप जानते हैं, लड़का-लड़की अलग जाति के हैं?मैंने पूछा- मनुष्य जाति के तो हैं न?…. कम से कम मनुष्य जाति में तो शादी हुई। अपने यहां तो मनुष्य जाति के बाहर भी महान पुरुषों ने शादी की है- जैसे भीम ने हिडिंबा से। 


क्या कारण है कि लड़के-लड़की को घर से भागकर शादी करनी पड़ती है? 24-25 साल के लड़के-लड़की को भारत की सरकार बनाने का अधिकार तो मिल चुका है, पर अपने जीवन-साथी बनाने का अधिकार नहीं मिलता 


वास्तव में परसाई जी भविष्य से अवगत थे उनकी चेतना उनकी कृत्यों में साफ़ नज़र आती हैं जहाँ वे विसंगतिओं,ढकोसलों ,धार्मिक कट्टरता जैसी समस्याओं पर अपनी लेखन से वार करते थे। 


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