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मिथिला के प्रसिद्ध साहित्यकार!

Kavishala LabsKavishala Labs October 18, 2021
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हे तिरहुत, हे मिथिले, ललाम !

मम मातृभूमि, शत-शत प्रणाम !

-नागार्जुन


"यहाँ हर कदम-कदम पर धरती बदले रंग यहाँ कि बोली में रंगोली साथ रंग" देश रंगीला गाने का यह अंश भारत में भाषा विविधता को बताती है ,जहाँ लिखित दस्तावेज के मुताबिक २३ भाषाएँ बोली जाती हैं पर उसके अलावा भी कई लोक भाषाएं हैं जो इस देश में बोली और समझी जाती है ,ऐसे में जरुरी है इन भाषाओ के बारे में जानना। इस लेख में हम बात करेंगे उत्तर भारत और पूर्वी नेपाल में लगभग ७ करोड़ लोगो द्वारा बोली जाने वाली प्रमुख भाषा मैथिली की जिसे २००३ में भारतीय संविधान की ८ सूची में सम्मिलित किया गया है ,वही नेपाल के अंतरिम संविधान में इसे २००७ में एक छेत्रिय भाषा के रुप में स्थान दिया गया है। बात करें इस भाषा की लिपि की तो मिथिलाक्षर तथा कैथी लिपि में लिखी जाने वाली इस भाषा की समानताएं बंगाल और असमिया लिपि से मिलती है। इतिहास की प्राचीनतम भाषाओं में से एक मैथिली भाषा का प्रथम प्रमाण रामायण में मिलता है। जो त्रेता युग में मिथिलानरेश राजा जनक की भाषा थी। 

सरल सहज यह भाषा अपनी मधुरता से कितनो का दिल जीत लेती है। सादगी से भरी मैथिली भाषा अपनेपन की खुशबु लिए सभी को अपनी और आकर्षित कर लेती है। बात करें इसके साहित्य की तो मैथिली भाषा का अपना एक गंभीर और श्रेष्ठम साहित्य है जिसमे विद्यापति जैसे कई महाकविओं की गणना हैं। तो आइये पढ़ते हैं मिथिला साहित्यकारों की प्रसिद्ध रचनाओं को।


विद्यापति : मैथिल कवि कोकिल के नाम से जाने जाने वाले मैथिली के सर्वोप्रिय कवि जिन्होंने श्रृंगार-परंपरा के साथ-साथ भक्ति परंपरा को अपनी लेखनी में उतारा कवि विद्यापति। इनकी रचनाओं में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरुप का रूपांतरण देखने को मिलता है। आज भी उनकी रचनाएं मैथिली संस्कृति में विद्यमान हैं। उनकी कुछ कृति आपके समक्ष प्रस्तुत है :


[जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि]

जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि

पशुपति भामिनी माया

सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि

अनुगति गति तुअ पाया


वासर रैनि सबासन शोभित

चरण चन्‍द्रमणि चूड़ा

कतओक दैत्‍य मारि मुख मेलल

कतओ उगिलि कएल कूड़ा


सामर बरन नयन अनुरंजित

जलद जोग फुलकोका

कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि

लिधुर फेन उठ फोंका


घन-घन-घनय घुंघरू कत बाजय

हन-हन कर तुअ काता

विद्यापति कवि तुअ पद सेवक

पुत्र बिसरू जनि माता


-विद्यापति


[गौरा तोर अंगना]

गौरा तोर अंगना।

बर अजगुत देखल तोर अंगना।


एक दिस बाघ सिंह करे हुलना।

दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना॥

हे गौरा तोर...


कार्तिक गणपति दुई चेंगना।

एक चढथि मोर एक मुसना॥

हे गौर तोर...


पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना।

सम्पति मध्य देखल भांग घोटना॥

हे गौरा तोर...


खेती न पथारि शिव गुजर कोना।

मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना॥

हे गौरा तोर ।


भनहि विद्यापति सुनु उगना।

दरिद्र हरन करू धएल सरना॥


-विद्यापति


आरसी प्रसाद सिंह : मैथिली के महाकवि आरसी प्रसाद सिंह जिन्होंने रूप ,यौवन और प्रेम के कवी के रूप में ख्याति प्राप्त की आज बिहार के चार नक्षत्रों में वियोगी के साथ याद किये जाते हैं। 

साहित्य अकादमी से सम्मानित महाकवि आरसी प्रसाद सिंह द्वारा रचित कुछ रचना आपके समक्ष प्रस्तुत है :


[बाजि गेल रनडँक, डँक ललकारि रहल अछि]

बाजि गेल रनडँक, डँक ललकारि रहल अछि

गरजि—गरजि कै जन जन केँ परचारि रहल अछि

तरुण स्विदेशक की आबहुँ रहबें तों बैसल आँखि फोल,

दुर्मंद दानव कोनटा लग पैसल कोशी—कमला उमडि रहल,

कल्लौल करै अछि के रोकत ई बाढि,

ककर सामर्थ्यल अडै अछि स्वीर्ग देवता क्षुब्धँ,

राज—सिंहासन गेलै मत्त भेल गजराज,

पीठ लागल अछि मोलै चलि नहि सकतै आब सवारी

हौदा कसि कै ई अरदराक मेघ ने मानत,

रहत बरसि कै एक बेरि बस देल जखन कटिबद्ध “चुनौती”

फेर आब के घूरि तकै अछि साँठक पौती ?

आबहुँ की रहतीह मैथिली बनल—बन्दिगनी ?

तरुक छाह मे बनि उदासिनी जनक—नन्दिनी डँक बाजि गेल,

आगि लँक मे लागि रहल अछि अभिनव

विद्यापतिक भवानि जागि रहल अछि


-आरसी प्रसाद सिंह


नागार्जुन -मैथिली के श्रेष्ठ कवियों में विद्यमान कवि नागार्जुन जिन्होंने मैथिली के साथ हिंदी में भी कई श्रेष्ठ रचनाएं की हैं। नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है। उनकी रचनाएं मैथिली संस्कृति में पूर्ण रूप से जीवित हैं। नागार्जुन द्वारा रचित मैथिली धाम को समर्पित कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है :


[हे तिरहुत, हे मिथिले, ललाम]


हे तिरहुत, हे मिथिले, ललाम!

मम मातृभूमि, शत-शत प्रणाम !

तृण तरु शोभित धनधान्य भरित

अपरूप छटा, छवि स्निग्ध-हरित

गंगा तरंग चुम्बित चरणा

शिर शोभित हिमगिरि निर्झरणा

गंडकि गाबथि दहिना जहिना

कौसिकि नाचथि वामा तहिना

धेमुड़ा त्रियुगा जीबछ करेह

कमला बागमतिसँ सिक्त देह

अनुपम अद्भुत तव स्वर्णांचल

की की न फुलाए फड़ए प्रतिपल

जय पतिव्रता सीता भगवति

जय कर्मयोगरत जनक नृपति

जय-जय गौतम, जय याज्ञवल्कय

जय-जय वात्स्यायन जय मंडन

जय-जय वाचस्पति जय उदयन

गंगेश पक्षधर सन महान

दार्शनिक छला’, छथि विद्यमान

जगभर विश्रुत अछि ज्ञानदान

जय-जय कविकोकिल विद्यापति

यश जनिक आइधरि सब गाबथि

दशदिश विख्यापित गुणगरिमा

जय-जय भारति जय जय लखिमा

जय-जय-जय हे मिथिला माता

जय लाख-लाख मिथिलाक पुत्र

अपनहि हाथे हम सोझराएब

अपनेक देशक शासनक सूत्र

बाभन छत्री औ’ भुमिहार

कायस्थ सूँड़ि औ’ रोनियार

कोइरी कुर्मी औ’ गोंढि-गोआर

धानुक अमात केओट मलाह

खतबे ततमा पासी चमार

बरही सोनार धोबि कमार

सैअद पठान मोमिन मीयाँ

जोलहा धुनियाँ कुजरा तुरुक

मुसहड़ दुसाध ओ डोम-नट्ट...

भले हो हिन्नू भले मुसलमान

मिथिलाक माटिपर बसनिहार

मिथिलाक अन्नसँ पुष्ट देह

मिथिलाक पानिसँ स्निग्ध कान्ति

सरिपहुँ सभ केओ मैथिले थीक

दुविधा कथीक संशय कथीक ?


ई देश-कोश ई बाध-बोन

ई चास-बास ई माटि पानि

सभटा हमरे लोकनिक थीक

दुविधा कथीक संशय कथीक ?

जय-जय हे मिथिला माता

सोनित बोकरए जँ जुअएल जोंक,

तँ सफल तोहर बर्छीक नोंक !

खएता न अयाची आब साग !

ककरो खसतैक किएक पाग ?

केओ आब कथी लै मूर्ख रहत ?

केओ आब कथी लै कष्ट सहत ?

केओ किअए हएत भूखैं तबाह ?

केओ केअए हएत फिकरें बताह ?

नहि पड़ल रहत, भेटतैक काज !

सभ करत मौज, सभ करत राज !

पढ़ता गुनता करता पास-

जूगल कामति, छीतन खवास

जे काजुल से भरि पेट खएत

ककरो नहि बड़का धोधि हएत

कहबओता अजुका महाराज

केवल कामेश्वरसिंह काल्हि

हमरालोकनि जे खाइत छी

खएताह ओहो से भात-दालि


अछि भेल कतेको युग पछाति

ई महादेश स्वाधीन आइ

दिल्ली पटना ओ दड़िभंगा

फहराइछ सभटा तिनरंगा

दुर्मद मानव म्रियमाण आइ

माटिक कण कण सप्राण आइ

नव तंत्र मंत्र चिंता धारा

नव सूर्य चंद्र नवग्रह तारा

सब कथुक भेल अछि पुनर्जन्म

हे हरित भरित हे ललित भेस

हे छोट छीन सन हमर देश

हे मातृभूमि, शत-शत प्रणाम!!


-नागार्जुन 



ईशनाथ झा : ईशनाथ झा मैथिली भाषा के कवि थे। उनका जन्म मधुबनी बिहार में हुआ था। उन्होंने मैथिली भाषा में कई रचनाएं की हैं जिनमे माला (कविता संग्रह) चीनीक लड्डू, उगना (नाटक) शकुन्तला, मृच्छकटिक (नाटक) महाभारत (आदिपर्व) अनुवाद, उनकी प्रमुख रचनाएं रही हैं। उनकी कुछ रचनाओं की प्रस्तुति आपके समक्ष प्रस्तुत है:


[की लय मधुमास मनाउ?]


की लय मधुमास मनाउ?

नव हरिअर वन,

नव मुदित सुमन,

तरु तरु पर गुंजित

मधुकर - गण

मधुकण बिनु नीरस कण्ठ हमर, की मधुमय तान लगाउ?

उर बीच ज्वलन,

अति विकलित मन,

वाणीपर नित

नव नव बन्धन,

रहि निराहार रागिनि बहार कम्पित स्वरसँ की गाउ?

की कहब अपन

दुखमय जीवन,

नीरवपर भीषण

असह दमन,

करु गायन वा चिर गौरव पर हम दृगजल अपन चढ़ाउ?

के करत भरण?

भए रहल हरण,

पद-पद पर

दारुण अनुशासन,

शिथलित वीणापर वेदनाक हम की अनुभूति सुनाउ?

कत करत सहन

ई जर्जर तन,

की उचित हमर

ई मूक मरण,

वा स्विग्ध-हीन निष्प्रभ दीपक हम अन्तिम ज्योति देखाउ?


-ईशनाथ झा




राजकमल चौधरी : मैथिली श्रेष्ठ साहित्यकारों में विद्यमान लेखक राजकमल चौधरी ने मैथिली में स्वरगंधा, कविता राजकमलक आदि कविता संग्रह, एकटा चंपाकली एकटा विषधर (कहानी संग्रह) तथा आदिकथा, फूल पत्थर एवं आंदोलन जैसी कई चर्चित रचनाएं की हैं। हिन्दी में उनकी संपूर्ण कविताएँ भी प्रकाशित हो चुकी हैं।[2] उनकी मैथिली कृतियों में ग्रामीण समाज के रूढ़िवादी ढाँचे पर गहरा प्रहार है। मैथिली में उन्होंने करीब १०० कवितायें, तीन उपन्यास, ३७ कहानियाँ, तीन एकांकी और चार आलोचनात्मक निबंध लिखे।


[चारू कात अन्हार]


चारू कात अन्हार

नदी-कातमे, मरघट्टीमे, बोन-बाघमे, झाँझ-झोपमे

कानि रहल छथि एक संग

आन्हर मनुक्ख, आ कुकूर, बाघ, सियार!

हमहीँ एकसर ताकि रहल छी

अनन्तमे शब्द। शब्दमे अर्थ। अर्थमे जीवन

जीवनमे एसकर हमहीँ

धूरा-गर्दा-कंकड़-पाथर फाँकि रहल छी।

की बताह अछि सौंसे समाज?

गाम छोड़िक’, खेत बेचिक’, राखि बन्हकी गहना-गुरिया

खान, फैक्टरी, कल-कारखाना दिस भागि रहल अछि।

गाम घरक, घर-डीहक नहि रहल काज?

सत्त कहू, छी अहाँ कत’?

पोथी-पत्रा, ज्ञान-ध्यान, जप, तन्त्र-मन्त्र सभ हारल-

दू आखरकेर पुष्पांजलि, ई प्रेम

क’ सकत स्पर्श की अहाँक हृदय?

चारू कात अन्हार

ग्राम-नगरमे, पथ-भ्रान्तरमे, वनमे बौअयलासँ लाभ?

जीवन समस्त, पृथ्वी समस्त अछि अन्धकूप

कूपमे चमकि रहल अछि विषधर मनियार!


-राजकमल चौधरी


[खिड़कीसँ नीचाँ ससरिकय]


खिड़कीसँ नीचाँ ससरिकय

इजोरिया

पसरि गेल अछि हरसिंगारक झमटगर

छाहरिमे

केबाड़क दोगमे नुका रहल अछि

हमरे कोनो कविताक

एकटा नवीन पाँती...

जेना हँसइत हो खिल खिल हमरे दुलारि

कन्या एहि जाड़मे बन्हने गाँती

आब जँ निन्न नहि भेल जीवन भरि

जागल रहि जायब

जीवन भरि एहि झमटगर छाहरिक

प्रत्याशामे

लागल रहि जायब


-राजकमल चौधरी


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