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बाल साहित्य : एक प्राचीन परंपरा

Kavishala LabsKavishala Labs November 14, 2021
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चंदा मामा दौड़े आओ,

दूध कटोरा भर कर लाओ।

उसे प्यार से मुझे पिलाओ,

मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ।

-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’


किसी भी राष्ट्रीय निर्माण के लिए जो सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं वो हैं उस राष्ट्रीय के बच्चे जिनपर देश का आने वाला कल निर्भर करता है ऐसे में जरुरी है सुनिश्चित करना की उनका विकास हर दृष्टिकोण से सही से किया जाए उनके अंदर सत्य निष्ठा साहस ,देश निर्माण व् देश भक्ति की भावना का जनन किया जाए। देश के प्रथम प्रधानमंत्री भी इस बात के समर्थक थे जिनका बच्चों के प्रति कितना स्नेह था इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक वर्ष उनके जन्मदिन के उपलक्ष में बाल दिवस मनाया जाता है। महान स्वतंत्रा सेनानी पंडित जवाहर लाल नेहरू जो आगे चलकर आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने उनका जन्म १४ नवंबर १८८९ को ब्रिटिश भारत में इलाहबाद में हुआ था। नेहरू जी एक महान लेखक थे जिन्होंने कई पुस्तकों की रचनाएं की। भारत की खोज जिनमे मुख्य रूप से प्रचलित है। आज के हमारे इस लेख का उद्देश्य आप सभी को बाल साहित्य का एक परिचय देना है। बाल साहित्य जो मुख्य और पारम्परिक रूप से मौखिक भाषा शैली पर आधारित होती है जिसके अन्तर्ग्रत समस्त साहित्य आता है जिसे बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर लिखा जाता है। बाल काल से ही बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए और उन्हें सही मार्ग दिखाने में जो सबसे सहायक हो सकता है वो बाल साहित्य ही है। इसमें रोचक कहानियां कविताएं एवं कथाएं प्रमुख होती हैं। वैसे तो इसकी शुरुआत बचपन में दादी-नानिओं द्वारा सुनाई कहानिओं से ही हो जाती है जिनमे वीरों जैसे प्रताप का घोड़ा ,झाँसी की रानी बच्चो के लिए मुख्य प्रेरणा दायक हैं। बाल साहित्य का उद्देश्य बच्चों को मजेदार कहानियां सुनाने के साथ बच्चों को नैतिक शिक्षा देना है। हांलाकि बाल साहित्य एक प्राचीनतं परंपरा है जो समय के साथ लिखित और फ़िल्मी माध्यम से आज के वक़्त में और समृद्ध हो रही है। विगत दशकों में कई महान लेखक हुए जिन्होंने बाल साहित्य को समृद्ध करने में अपना श्रेष्ठम योगदान दिया और आज भी उनकी लिखी कहानियां बच्चो के पाठ्यक्रम में विद्यमान हैं। इनमे सर्वश्रेष्ठ हैं बाल साहित्य के जनक माने जाने वाले जयप्रकाश भारती जिनकी लिखी अनेकों पुस्तकें यूनेस्कों एवं भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत की गयी हैं। नैतिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक विषयों पर बाल साहित्य को अत्यधिक समृद्ध बना है। इसी क्रम में विख्यात लेखक प्रेमचंद का भी नाम शुमार है जिनकी लिखी कहानियां उपन्यास बाल साहित्य में विद्यमान हैं। उनकी लिखी प्रसिद्ध बाल कहानियां ईदगाह ,दो बैलो की कथा ,सच्चाई का उपहार ,बड़े भाई साहब ,गुल्ली -डंडा आदि की गिनती हैं। 

हांलाकि आज के दौर में बच्चों के भीतर इन कहानियों को पढ़ने की रूचि कम हो गयी है जिसका बाल साहित्य के मूल्य का वर्त्तमान और भविष्य में घटने की दिशा में है। अतः आवशयकता है समय रहते इस धरोहर को बचाना और बच्चो को कहानियां ,उपन्यासों के जरिये नैतिक मूल्यों से बारे में शिक्षा देना। आज बाल दिवस के उपलक्ष में आइये पढ़ें कुछ बेहतरीन बाल कविताओं को :

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,

सिलवा दो मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।


सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,

ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।


आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का,

न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।


बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘‘अरे सलोने!

कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।


जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,

एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।


कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,

बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।


घटता-बढ़ता रोज़ किसी दिन ऐसा भी करता है,

नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है।


अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएं,

सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए।

-रामधारी सिंह 'दिनकर'



आज उठा मैं सबसे पहले!

सबसे पहले आज सुनूँगा,

हवा सवेरे की चलने पर,

हिल, पत्तों का करना ‘हर-हर’

देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले,

लाल, सुनहले!


आज उठा मैं सबसे पहले!

सबसे पहले आज सुनूँगा,

चिड़िया का डैने फड़का कर

चहक-चहककर उड़ना ‘फर-फर’

देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले,

लाल सुनहले!


आज उठा मैं सबसे पहले!

सबसे पहले आज चुनूँगा,

पौधे-पौधे की डाली पर,

फूल खिले जो सुंदर-सुंदर

देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले?

लाल, सुनहले


आज उठा मैं सबसे पहले!

सबसे कहता आज फिरूँगा,

कैसे पहला पत्ता डोला,

कैसे पहला पंछी बोला,

कैसे कलियों ने मुँह खोला

कैसे पूरब ने फैलाए बादल पीले,

लाल, सुनहले!


आज उठा मैं सबसे पहले!




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