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भक्ति रस : श्रद्धा की अभिव्यक्ति के भाव को व्यक्त करने वाला रस

Kavishala LabsKavishala Labs October 30, 2021
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भक्ति रस की परिभाषा — इसके अनुसार ईश्वर की भक्ति को मान्यता प्राप्त है, साथ ही किसी पूज्य व्यक्ति को भी भक्ति रस का आलंबन मान सकते हैं।

भक्तिकालीन कवियों ने ईश्वर की आराधना दास्य स्वभाव तथा साख्य भाव से किया था। इसमें प्रमुख थे तुलसीदास , सूरदास , कालिदास , मीराबाई आदि। इन्होंने आजीवन अपने ईश्वर की भक्ति नहीं छोड़ी। भक्ति के मार्ग पर चलकर उन्होंने अनेकों – अनेक कठिनाइयों का सामना किया। किंतु फिर भी भक्ति रस को आचार्यों ने मान्यता नहीं दी। आधुनिक विद्वानों ने इस पर शोध किया और भक्ति रस को स्वतंत्र रूप से स्थापित करने में सफलता हासिल की।

निम्न लिखित कुछ कविताएं भक्ति रस के उदाहरण है :-

(i) "दूलह श्री रघुनाथ बने दुलही सिय"

दूलह श्री रघुनाथ बने दुलही सिय सुंदर मंदिर माही। 

गावति गीत सबै मिलि सुन्दरि वेद जुवा जुरि विप्र पढ़ाही।

राम को रूप निहारति जानकी कंगन के नग की परछाहीं।

यातै सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही पल टारत नाहीं।।

— तुलसीदास

व्याख्या : तुलसीदास जी ने राम के विवाह का वर्णन किया है। कि रामचंद्र जी दूल्हा बने हैं और सीता जी दुल्हन बनी है। विवाह जनक जी के महल में हो रहा है। महल में उत्सव का माहौल है। युवा ब्राह्मण वेद की रचनाएं गा रहे हैं। इस प्रकार का उच्चारण और विवाह के गीत से सारा महल गूंज रहा है। सीता जी ने एक नग वाला कंगन पहन रखा है। जिसमें श्री राम जी का प्रतिबिंब दिखाई पड़ रहा है। इसमें सीता जी बड़े ध्यान से रामजी का प्रतिबिंब देख रही है। एक पल के लिए भी उनकी नजर इस नग से दूर नहीं जाती है।

(ii) "जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे"

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे । 

काको नाम पतित पावन जग, केहि अति दीन पियारे ।

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे । 

कौनहुँ देव बड़ाइ विरद हित, हठि हठि अधम उधारे । 

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे । 

खग मृग व्याध पषान विटप जड़, यवन कवन सुर तारे ।

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे । 

देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज, सब माया विवश बिचारे । 

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे । 

तिनके हाथ दास 'तुलसी' प्रभु, कहा अपुनपौ हारे ।

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे ।

— तुलसीदास

व्याख्या : तुलसीदास जी प्रभु राम के वनवास समय का वर्णन करते हुए कहते हैं कि, जिस तरह तोता अपने पुराने पंखों को त्याग कर नए पंख धारण करता है उसी प्रकार प्रभु श्री राम जी ने अपने राजसी वस्त्रों और आभूषणों का त्याग कर सन्यासी का वेश धारण कर लिया है। जिस प्रकार पानी के ऊपर काई की परत हट जाने पर, साफ जल दिखाई देता है। उसी प्रकार श्रीराम का सौंदर्य और भी निखर आया है। श्री राम जी के साथ सीता जी और लक्ष्मण जी साथ जा रहे हैं। उन्हें महल और राजसी सुखों की तनिक भी चिंता नहीं है। किसी ने भी राजसी वैभव को त्यागने में जरा भी आवश्यकता नहीं दिखाई। अतः प्रभु मोह माया के बंधनों से मुक्त है।

(iii) "पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो"

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।

वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥

जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।

खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥

सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।

'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥

— मीराबाई

व्याख्या : यहा कृष्ण की दीवानी मीरा बाई कहती हैं कि, मुझे राम रूपी बड़े धन की प्राप्ति हुई है। मेरे सद्गुरु ने मुझपर कृपा करके ऐसी अमूल्य वस्तु भेट की हैं, उसे मैंने पूरे मन से अपना लिया हैं। उसे पाकर मुझे लगा मुझे ऐसी वस्तु प्राप्त हो गईं हैं, जिसका जन्म-जन्मान्तर से इन्तजार था। जब से यह नाम मुझे मिला है, तब से मेरे लिए दुनिया की सब चीजें खो गई है। यह नाम रूपी धन की विशेषता है कि, वह खर्च करने पर ना तो घटता है, ना कोई चुरा सकता है, यह दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है। यह धन है जो मोक्ष का मार्ग दिखता है। इस नाम को अर्थात श्री कृष्ण को पाकर मीरा ने खुशी-खुशी से उनका गुणगान करती है।

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