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अद्भुत रस : आश्चर्य एवम् विस्मय की अभिव्यक्ति के भाव को व्यक्त करने वाला रस

Kavishala LabsKavishala Labs October 22, 2021
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अद्भुत रस — जब किसी व्यक्ति के मन में अद्भुत या आश्चर्य वस्तुओं को देखकर विस्मय, आश्चर्य, आदि का भाव उत्पन्न होता है, तो वहां अद्भुत रस प्रकट होता है। इसके अंदर रोमांच, आंसू का आना, कापना, गदगद होना, आंखें फाड़ कर देखना, आदि के भाव व्यक्त होते हैं। या फिर यह कह सकते हैं कि, जहां चकित कर देने के दृश्य के चित्रण से जो रस उत्पन्न होता है उसे अद्भुत रस कहते हैं। जिसमें दृष्टि और मस्तिष्क क्षणिक भर के लिए स्तब्द हो जाता है और उसके आकार, आदि को विस्मय भाव से देखता रह जाता है।

निम्न लिखित कुछ कविताएं अद्भुत रस के उधारण है :-

(i) "लक्ष्मी थी या दुर्गा थी"

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।  

— सुभद्रा कुमारी चौहान  

व्याख्या : प्रस्तुत पंक्तियां वीरांगना लक्ष्मी बाई के शौर्य पराक्रम से उत्पन्न विस्मय भाव को प्रदर्शित करता है। लक्ष्मी बाई ने स्वयं स्त्री होकर अपने राज्य की रक्षा के लिए अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने युद्ध भूमि में अपने प्राण गवाया किंतु अंग्रेजों और आक्रमणकारियों के आगे अपने शस्त्र नहीं डालें। उनके इस उत्साह और पराक्रम ने अद्भुत चमत्कार प्रस्तुत किया। इस भाव को देखकर वह साक्षात लक्ष्मी या दुर्गा की अवतार प्रतीत होती है जिसे देखकर मराठे भी गर्व की अनुभूति करते हैं।

(ii) "विचार आते हैं"

विचार आते हैं

लिखते समय नहीं

बोझ ढोते वक़्त पीठ पर

सिर पर उठाते समय भार

परिश्रम करते समय

चांद उगता है व

पानी में झलमलाने लगता है

हृदय के पानी में

विचार आते हैं

लिखते समय नहीं

...पत्थर ढोते वक़्त

पीठ पर उठाते वक़्त बोझ

साँप मारते समय पिछवाड़े

बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त

पत्थर पहाड़ बन जाते हैं

नक्शे बनते हैं भौगोलिक

पीठ कच्छप बन जाती है

समय पृथ्वी बन जाता है...

— कवि गजानन माधव

व्याख्या : पीठ पर बोझ ढोते वक्त, सिर पर भार उठाते वक्त, परिश्रम करते समय, यह विचार आते हैं कि, चांद उगता है हृदय के पानी में झिलमिलाने लगता है। यह विचार लिखते समय नहीं आते। पत्थरों को पीठ पर ढोते हुए, बोझ बच्चों को पीछे लादते वक्त विचार आते हैं। एक ऐसा विचार कि पत्थर पहाड़ बन जाते हैं। पीठ हमारी कछुआ बन जाती है। और समय पृथ्वी बन जाती है। जैसे कच्छप अवतार में श्री हरि ने, पीठ पर पृथ्वी उठा रखी थी।

(iii) "देख यशोदा शिशु के मुख में"

देख यशोदा शिशु के मुख में, 

सकल विश्व की माया। 

क्षण भर को वह बनी अचेतन, 

हिल न सकी कोमल काया।

केशव नहीं न जाये का कहिये,

देखत तब रचना विचित्र,

अति समुझी मन ही मन दहिए है।

व्याख्या : जब शिशु रूप कृष्ण मिट्टी खाते हैं, तो यशोदा मां मुख को खुलवाती है। ताकि, मिट्टी साफ कर सके। परंतु, बाल रूप कृष्ण विचित्र रचना रचते हैं। जो दिमाग से परे थी। मां यशोदा ने मुंह में सारा ब्रह्मांड देखा। यह माया देखकर क्षण भर में के लिए वह आश्चर्यचकित रह गई और अपना शरीर भी नहीं हीला सकी। कुछ विस्मय की स्थिति थी, कि कुछ बोल भी ना सकी कि, बालक के मुंह में पूरा ब्रह्मांड कैसे समा सकता है।

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