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ज्ञानपीठ पुरस्कृत पद्मभूषण आचार्य सत्यव्रत शास्त्री से शास्त्री कोसलेन्द्रदास की बातचीत

Kavishala InterviewsKavishala Interviews November 15, 2021
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संस्कृत साहित्य में सूनापन पसरा हुआ है। सत्यव्रत शास्त्री नहीं रहे। उनका परिचय उनका नाम है। उनका काम है। बदलते साहित्यिक मिजाज के बीच वे संस्कृत के सारथी थे। 2012 में राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के गेस्ट हाउस में उनसे एक लंबी बातचीत हुई थी, जो 'मधुमती' में छपी थी। आज जब वे नहीं हैं तो उनसे हुई बातचीत का संपूर्ण हिस्सा यहां है।


(ज्ञानपीठ पुरस्कृत पद्मभूषण आचार्य सत्यव्रत शास्त्री से शास्त्री कोसलेन्द्रदास की बातचीत)

[संस्कृत को एक शांत संघर्ष की आवश्यकता है : आचार्य सत्यव्रत शास्त्री]


1. भारत में संस्कृत को सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए था, वह अभी तक क्यों नहीं मिला?

ऐसा बिलकुल नहीं है। हमारे राष्ट्र के भाषायी स्वरूप में संस्कृत निर्विवाद रूप से सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित है। इसके दो कारण हैं - प्रथम यह कि संस्कृत विश्व की प्राचीनतम महनीय भाषा है। दूसरा है कि केवल संस्कृत का साहित्य ही विश्व में सर्वाधिक पुरातन है। भारत की सारी प्रादेशिक भाषाओं का प्रेरणास्रोत संस्कृत साहित्य है। हमारे देश की किसी भी प्रादेशिक भाषा को ले लीजिए, उस भाषा के सारे प्रारंभिक लेखक संस्कृत के भी विद्वान् थे। यही कारण है कि भारत की किसी भी प्रादेशिक भाषा में लिखे साहित्य में संस्कृत का स्वर और पुट भरपूर मात्रा में है। उदाहरण के लिए हिंदी को ही लीजिए। हिंदी में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारीसिंह ‘दिनकर’ आदि कवियों की रचनाएं संस्कृतनिष्ठ हैं। ‘कामायनी’ को बिना अच्छे-खासे संस्कृत ज्ञान के समझना संभव नहीं है। मैंने अनेक संस्कृत न जानने वाले हिंदी के विद्वानों को ‘कामायनी’ पढ़ाई है क्योंकि संस्कृत में निबद्ध जटिल भारतीय दर्शन को जाने बगैर कामायनी समझ आ ही नहीं सकती। प्रादेशिक भाषाओं ने अपने कथानक-काव्य-उपन्यासों की विषय-वस्तु संस्कृत वाङ्मय से ही ली है। रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक आख्यान सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य के मूल स्रोत रहे हैं, यह बात निर्विवाद रूप से सच्ची है।


2. क्या अब तक हिंदी के राष्ट्रभाषा नहीं बन पाने का नुकसान संस्कृत ने भी उठाया है?

नहीं, नहीं। इसका कोई प्रभाव संस्कृत पर नहीं पड़ा। मेरा तो मानना है कि संस्कृत को ही हमारी राष्ट्रभाषा बनाना चाहिए था। आज हिंदी का जो भी विरोध है, उसके पीछे एक तर्क है। लगता है कि उस तर्क को नकारा भी नहीं जा सकता। जहाँ तक हिंदी का संबंध है तो हिंदी किसी एक प्रदेश विशेष की भाषा नहीं है। देश का एक बहुत बड़ा भाग हिंदीभाषी है। हिंदी की बोलियाँ जरूर अनेक हैं पर हिंदी की खड़ी बोली का जो स्वरूप है, वह लगभग सर्वमान्य है। हिमाचल प्रदेश से लेकर बिहार होते हुए राजस्थान-मध्यप्रदेश तक का क्षेत्र हिंदी क्षेत्र है। संविधान ने इसी व्यापकता के कारण हिंदी को हमारी राष्ट्रभाषा बनाया था। इससे दक्षिण भारत, पूर्वी भारत या पश्चिमी भारत के लोगों को लग रहा है कि हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों को इससे स्वाभाविक लाभ मिल रहा है। हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों की मातृभाषा हिंदी है और राष्ट्रभाषा भी हिंदी ही है। जबकि अन्य लोगों की मातृभाषा हिंदी नहीं है, अत: उन्हें हिंदी सीखनी पड़ती है। इसी विषय पर लोगों में टकराव आ रहा है। उस टकराव को तभी मिटाया जा सकता था जब संस्कृत राष्ट्रभाषा होती क्योंकि उस समय संस्कृत किसी की भी मातृभाषा नहीं थी। इस कारण संस्कृत सबको सीखनी पड़ती और यह विवाद होता ही नहीं, ठीक उसी तरह जिस तरह से हिब्रू भाषा के साथ हुआ। डॉ. भीमराव आंबेडक़र जैसे दूसरे कई विद्वानों ने संस्कृत को यह स्थान दिलवाने की भरसक कोशिश की थी। आंबेडक़र का मानना था कि देश को भाषाई एकसूत्र में पिरोने का काम संस्कृत ही कर सकती है। लेकिन जिस समय यह निर्णय किया जाना चाहिए था, उस समय यह नहीं लिया गया। अब यदि हम संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने की बात करते हैं तो इसमें पर्याप्त कठिनाइयाँ आने की संभावना है। यहाँ तक की हिंदी क्षेत्र में ही इसका विरोध होने लगेगा। हाँ, हिंदीतर क्षेत्र के प्रांतों में जहाँ हिंदी का व्यवहार नहीं होता, उन लोगों को संस्कृत सीखने में कदाचित् आसानी हो सकती है, क्योंकि वहाँ की भाषा में संस्कृत की प्रचुर शब्दावली है। वैसे प्रचुर शब्दावली तो हिंदी में भी संस्कृत की ही है।भारत में चार भाषा परिवार है, जिनका मुख्य रूप से व्यवहार हमारे यहाँ होता है। पहला आर्य भाषा परिवार (इन्डो आर्यन फैमिली), दूसरा द्रविड भाषा परिवार, तीसरा हिमालयी (तिब्बतो) भाषा परिवार और चौथा आदिवासी भीली, कोली, मुंडारी इत्यादि भाषा परिवार (ऑस्ट्रिक)। इन चार भाषा परिवारों में हिंदी प्रथम भाषा परिवार, आर्य भाषा परिवार की है। इस भाषा परिवार में गुजराती, मराठी, बांग्ला, पंजाबी और उडिय़ा आदि भाषाएं है। इन सभी भाषा परिवारों की भाषाओं में अंतर इतना है कि जहां आर्य भाषा परिवार की भाषाओं में विशेषकर हिंदी में तद्भव शब्दों का अधिक प्रयोग है वहीं द्रविड परिवार की भाषा में तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक है। यह प्रयोग संस्कृत को इन भाषाओं के बहुत निकट ले जाता हैं। जैसे हिंदी में हम ‘नींद’ कहते हैं पर द्रविड भाषाओं में ‘निद्रा’ कहा जाता है। ‘निद्रा’ संस्कृत का शुद्ध शब्द है, जो भारत की अनेक प्रादेशिक भाषाओं में यथावत् प्रयुक्त होता है। यदि द्रविड भाषाओं में संस्कृत शब्दों के प्रतिशत की बात करें तो मळयालम में लगभग 70 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। तेलुगु और कन्नड़ में भी 60-70 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। तमिळ में भी पर्याप्त शब्द संस्कृत के हैं। इस तरह से दक्षिण की लगभग सभी भाषाओं में प्रचुर संख्या में संस्कृत के शब्द हैं। पूर्वी भारत की बात करें तो वहाँ की उडिय़ा, असमिया और बांग्ला में संस्कृत शब्दों की भरमार ही है। हमारे राष्ट्रगीत में मात्र क्रियापद में भेद है, शेष सारे संस्कृत के शब्द हैं। ‘वन्दे मातरम्’ में ही देखिए-‘सुजलां-सुफलां-मलयजशीतलाम्, सस्यश्यामलां मातरम्’ आदि सारे संस्कृत शब्द हैं जबकि एक तरह से इसे बांग्ला में माना जाता है। संस्कृत तो एक ऐसा सूत्र है जो सारे देश को एक भाषायी धरातल पर एकसाथ लाने में समर्थ है। अब संस्कृत को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रस्तुत करने में यदि कठिनाइयाँ भी हैं तो इतना तो हम कर ही सकते हैं कि संस्कृत भाषा को खूब प्रोत्साहित किया जाए। इस भाषा का प्रचलन बहुत अधिक हो। इससे यह होगा कि पूरे देश में तत्तत्-भाषा-भाषी लोग अपने-आपको एक-दूसरे के निकट पायेंगे। पूरे देश में एक निकटता आयेगी और उस निकटता को लाने में एकमात्र संस्कृत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


3. संस्कृत को जब सांप्रदायिकता से जोडक़र देखा जाता है तो आपको कैसा लगता है?

नहीं, यह बात सर्वथा निराधार व निर्मूल है। मैं इसका पूरी तरह से खंडन करता हूँ। संस्कृत को किसी भी धर्म या संप्रदाय अथवा जाति विशेष से संबद्ध करना पूरी तरह से अनुचित है। संस्कृत के विकास में मुसलमानों व ईसाइयों का बहुत बड़ा योगदान है। 2005 में 7 खण्ड़ों में मेरा 2000 पृष्ठों का एक ग्रंथ आया था-‘डिस्कवरी ऑफ संस्कृत ट्रेजर्स’। थाईलैंड की राजकुमारी महाचक्री सिरिन्थौर्न ने इसका विमोचन किया था। उस ग्रंथ में एक सुदीर्घ विवेचन इसी विषय पर हुआ है-‘कंट्रीब्यूशन ऑफ मुस्लिम्स टू संस्कृत’। इसी तरह से ‘क्रिश्चियन लिट्रेचर इन संस्कृत’ पर मैंने काम किया है। ईसाइयों ने तो श्रीमद्भगवद्गीता की तर्ज पर ‘ख्रिस्तु गीता’ का प्रणयन किया है। केरल के पी.सी. देवस्सिआ ने 36 सर्गों में एक सुंदर व ललित महाकाव्य लिखा है ‘ख्रिस्तुभागवतम्’, जिस पर उन्हें 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसी तरह ‘यीशुचरितम्’, ‘यीशुमाहात्म्यम्’ और ‘यीशुसौरभम्’ जैसे अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं। यहाँ तक की विष्णुसहस्रनामस्तोत्र की तरह ‘ख्रिस्तुसहस्रनामस्तोत्र’ भी लिखा गया। इसी तरह अनेक मुस्लिम संस्कृत विद्वान् हुए हैं। तिरुपति के राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ में एक मुस्लिम संस्कृत प्राध्यापक ने ‘माधवीयधातुवृत्ति:’ पर काम किया है। आज ही नहीं प्राचीन काल से ही मुस्लिम विद्वानों ने संस्कृत पर लेखनी चलाई है। अब्दुल रहीम खानेखाना ने ‘खेटकौतुकम्’ व ‘रहीमकाव्यम्’ लिखा है, जो बड़ा सुप्रसिद्ध काव्य है। उस दौर में अनेक ऐसे भी ग्रंथ लिखे गये थे, जिनमें मणिप्रवाल शैली में आधे श्लोक को उर्दू, ब्रज, अवधी या भोजपुरी में और आधे को संस्कृत में लिखा गया है। एक प्रसिद्ध श्लोक है-

एकस्मिन् दिवसावसानसमये मैं था गया बाग में

काचित् तत्र कुरङ्गबालनयना गुल तोड़ती थी खड़ी।

तां दृष्ट्वा नवयौवनां शशिमुखीं मैं मोह में जा पड़ा

तत्सीदामि सर्दव मोहजलधौ हा दिल गुजारे शुकर।।


ऐसी कई रचनाएं उस दौर में लिखी गई। एक जगन्नाथ त्रिशूली नाम के पंडित थे बादशाह शांहजहाँ और बेगम मुमताज के पास। त्रिशूली पंडित जो भी रचना करते थे, अब्दुल रहीम खानेखाना को सुनाया करते थे। एक बार उन्होंने एक पद्य लिखा और उसे सुनाने रहीम के पास पहुंचे। तब रहीम वकील (प्रधान मंत्री)जैसे उच्च पद पर थे। वह पद्य था-

प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु मित्रेषु बन्धुवर्गेषु।

नापकृतं नोपकृतं नोपकृतं किं कृतं तेन?।।


अर्थात् अधिकार के पद बड़े चंचल होते हैं। (आज हैं, कल शायद न रहें।) इन्हें प्राप्त कर यदि किसी ने शत्रुओं का अपकार (हानि) नहीं किया और मित्रों तथा बंधुओं का उपकार नहीं किया तो उसने किया क्या? (इस पद्य में यथासंख्य अलंकार है।)

अब्दुल रहीम खानेखाना ने इस पद्य को बड़े गौर से सुना और त्रिशूली पंडित से कहा कि आपने बहुत सुंदर पद्यरचना की है पर लगता है आप इसमें एक जगह मात्रा का प्रयोग करना भूल गए। त्रिशूली ने पूछा, कहाँ? रहीम ने कहा कि आपने जो ‘शत्रुषु नापकृतम्’ लिखा है, वहाँ भी ‘ना’ के स्थान पर ‘नो’ कर दीजिए ताकि ‘शत्रुषु नोपकृतम्’ हो जाए। शत्रुओं के प्रति भी अपकार कि अपेक्षा उपकार ही किया जाए। अर्थात् तीनों ही जगह ‘नोपकृतं नोपकृतं नोपकृतं किं कृतं तेन?’ कर दीजिये।

अभी भी अनेक मुस्लिम संस्कृत विद्वान् हैं, जो निरंतर संस्कृत लेखन कर रहे हैं। इसी तरह हिंदी के विकास में भी अनेक मुसलमानों के नाम हैं। हिंदुओं ने भी उर्दू में खूब लिखा हैं। स्पष्ट है कि भाषा का किसी धर्म विशेष से संबंध नहीं होता। संस्कृत भी किसी धर्म विशेष से जुड़ी हुई नहीं रही और न ही इसे जुडऩा चाहिए।


4. संस्कृत को बढ़ाने के लिये जो प्रयास सरकार कर रही हैं उसमें क्या कुछ ओर किया जाना चाहिए?

संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिये मेरा सुझाव है कि इसमें संस्कृतज्ञों को आगे आना चाहिए। सारा कार्य सरकार पर ही नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार आर्थिक सहायता या अन्य सुविधाएं देगी। पर आगे तो व्यक्ति और समाज को ही आना पड़ेगा। संस्कृत के प्रत्येक अध्यापक को संस्कृत अध्यापन को एक मिशन की तरह लेना चाहिए। यह बहुत बड़े दायित्व का काम होगा। साथ ही, संस्कृत की नि:शुल्क कक्षाएं प्रारंभ करनी चाहिए। संस्कृत को जीवित रखना बेहद जरूरी है, यह हम सबका कर्तव्य है। हमें यह समझना चाहिये कि मेरा पुण्य है कि मुझे संस्कृत की सेवा करने का अवसर मिल रहा है। वेतनभोगी के रूप में संस्कृत को कभी नहीं लेना है। जीविका उपार्जन के लिये भी संस्कृत को नहीं लेना है क्योंकि जीविका उपार्जन तो ओर तरीके से भी हो सकता है। संस्कृत अध्यापक को चाहिए कि वह समाज के भीतर संस्कृत में रुचि रखने वाले लोगो को ढूंढे और उन तक संस्कृत को पहुँचाए। अनेक लोग संस्कृत सीखना चाहते हैं, चाहे वो धार्मिक भावना से सीखना चाहें या अन्य किसी कारणवश। देश-विदेश में लोगों में संस्कृत सीखने की एक ललक है। साथ में यह भी जरूरी है कि समाज के बीच संस्कृत के महत्त्व को बताया जाए। हम लोगों ने यदि अभी 5-7 वर्ष लगा दिए तो ये काफी महत्त्वपूर्ण होंगे। दिनों-दिन संस्कृत पर संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में अब समाज को यह बोध कराना होगा कि अभी का समय संस्कृत के जीवन-मरण का प्रश्र है, अत: सबको आगे आना होगा।

संस्कृत के पिछडऩे का एक बड़ा कारण यह भी है कि संस्कृत पढ़ाने वाले अध्यापक स्वयं ही अपने बच्चों को संस्कृत नहीं पढ़ाते। आज अधिकांश संस्कृत विद्वान्, जिनकी जीविका संस्कृत से चलती है उनके बच्चे संस्कृत नहीं पढ़ते। संस्कृत की तरफदारी करने वालों के बच्चे अंगे्रजी स्कूलों में पढ़ते हैं। आज मैं स्वयं दोषी हूँ कि मैंने जो विद्याएं अपने पिताजी (स्वर्गीय श्रीचारुदेव शास्त्री) से प्राप्त की थी, उसमें मेरे बच्चे दीक्षित नहीं हो पाए। संस्कृत जगत् में ऐसे 5 प्रतिशत से ज्यादा विद्वान् नहीं होंगे, जिनकी संतान संस्कृत पढ़ती होगी। क्या यही संस्कृत के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और भक्ति है? इस प्ररिप्रेक्ष्य में जब संस्कृतज्ञों की ही संस्कृत के लिए प्रतिबद्धता नहीं हैं तो सामान्य जन को भला क्या लेना-देना? संस्कृत के विकास में यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका जवाब कोई नहीं देना चाहता! मेरा इसी बात पर जोर है कि सबसे पहले जितना जल्दी हो सके संस्कृत को इस बीमारी से दूर हो जाना चाहिये। आज संस्कृत पढ़ाने वालों को पर्याप्त वेतन मिल रहा है पर नतीजे आपके सामने हैं।


5. आप मानते हैं कि आधुनिक दौर में संस्कृत में लोकप्रिय साहित्य और काव्य या अन्य किसी विधा में अच्छा न लिखे जाने के कारण संस्कृत के प्रचार-प्रसार में कठिनाई आ रही है?

बहुत अच्छा प्रश्न है यह। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि संस्कृत में प्रचुर मात्रा में बहुत अच्छा लिखा जा रहा है केवल इतनी बात है कि कतिपय विधाओं में बिल्कुल नहीं लिखा जा रहा। संस्कृत साहित्य की स्थिति यह है कि कतिपय विधाओं में तो यह अत्यंत समृद्ध है पर कतिपय विधाओं में अत्यंत दरिद्र है। संस्कृत में काव्य, नाटक, टीका, टिप्पणी, भाष्य आदि सब तो बहुत हैं परंतु पत्र लेखन, डायरी या आत्मकथा इत्यादि का अत्यंताभाव (कहीं भी न होना) है। कुछ वर्षों पहले मेरी संस्कृत भाषा में लिखी जाने वाली पहली डायरी प्रकाश में आई। मैंने उसका नाम रखा-‘दिने दिने याति मदीयजीवितम्’ अर्थात् प्रतिदिन मेरा जीवन जा रहा है, बीत रहा है। ऐसा नहीं है कि संस्कृत में डायरी या आत्मकथा लिखी नहीं जा सकती थी पर वहाँ तक विद्वानों की दृष्टि ही नहीं जा पाई। स्वतंत्रता संग्राम में एक शिखरस्थ सेनानी थे माधवश्री हरिअणे। उन्होंने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की जीवनी पर संस्कृत पद्यों में ‘तिलकयशोऽर्णव:’ नाम से 3 खंडों में लिखी थी। चाहते तो वे अपनी जीवनी भी लिख सकते थे पर उन्होंने नहीं लिखी। यदि वे लिखते तो उस समय के स्वतंत्रता संग्राम की अनेक जानकारियाँ हमें उससे मिल जाती।

इधर 2015 और 2017 में ‘भवितव्यानां द्वाराणि भवन्ति सर्वत्र’ शीर्षक से मेरी आत्मकथा दो खंडों में प्रकाशित हुई है, जो कि संस्कृत में लिखी जाने वाली पहली आत्मकथा है। इसका तीसरा खंड प्रकाशनाधीन है। सभी खंडों को मिला करके इसकी पृष्ठ संख्या 1000 से अधिक होगी। मेरे जीवन में बहुत सी अनहोनी घटनाएं घटीं। एक सुदीर्घ शृंखला ही है उनकी। अत: महाकवि कालिदास की पंक्ति ‘भवितव्यानां द्वाराणि भवन्ति सर्वत्र’ को ही मैंने शीर्षक रूप में अपना लिया। इसी प्रकार पत्र-साहित्य भी संस्कृत में नहीं के बराबर है। इस विधा में भी दो खंडों का पद्यमय ‘पत्रकाव्यम्’ संस्कृत में मेरा पहला पद्यमय पत्रों का संकलन है। गद्यमय संस्कृत पत्रों का संकलन जयपुर के आचार्य नवलकिशोर शर्मा ‘कांकर’ का पहले से है।


6. अनेक देशों में रहने के बाद आप तमाम विदेशी भाषाओं में संस्कृत को कहाँ मानते हैं?

विदेशी भाषाओं में पहले हमें एक विभाजन करना होगा। एक विदेशी भाषा परिवार है दक्षिण-पूर्व एशिया और दूसरा है सुदूर-पूर्व तथा तीसरा यूरोप। जहाँ तक दक्षिण-पूर्व एशिया की भाषाएं हैं, उनमें प्रचुर शब्दावली संस्कृत की है। अभी मेरे संपादन में ही एक बृहद् ग्रंथ आया है-‘संस्कृत वॉकुबलेरी ऑफ साउथ-ईस्ट एशिया’। जबकि भारतीय भाषाओं में संस्कृत की शब्दावली पर काम होना अभी बाकी है। एक तरह से हमें पता ही नहीं है कि तेलुगु या कन्नड या मळयालम और हरियाणवी-पंजाबी-राजस्थानी में कितने शब्द संस्कृत के हैं? हम संस्कृत शब्दों के अधिकतम, अधिकतर या अधिक प्रयोग के आधार पर प्र्रतिशत का निर्णय करने लगते हैं। वैज्ञानिक रूप से कितने शब्द संस्कृत के हैं और कितने देशज, यह काम होना अभी बाकी है।

आश्चर्य तब होता है जब हम पाते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया की भाषाओं में संस्कृत शब्द अच्छी तादाद में हैं। हाँ, मूल उच्चारण में जरूर थोड़ा-बहुत अंतर है ठीक वैसे ही है जैसे हमारे यहाँ ‘घट’ का ‘घड़ा’ बन गया। विदेशों में इतने सटीक संस्कृत शब्द हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया के बहुत से शब्दों को यदि देख लिया गया होता तो बहुत से शब्दों को गढऩे की जरूरत ही नहीं पड़ती। ‘दक्षिण-पूर्व’ दिशा के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में यह शब्द है-आखने, जो कि संस्कृत के ‘आग्रेय’ शब्द का रूप है। यदि थाई भाषा में दक्षिण-पूर्व कहना हो तो कहा जाएगा ‘आस्या आखने’ कहेंगे। बैंकाक में 9 विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से 7 के नाम संस्कृत पर आाधारित हैं और दो राजाओं के नाम पर। एक विश्वविद्यालय का नाम है-धर्मशास्त्र विश्वविद्यालय। इस विश्वविद्यालय की एक बिल्डि़ंग का नाम है-साला अनेक प्रसंग अर्थात् शाला अनेक कार्य हेतु (मल्टी पर्पज बिल्डिंग)। लाओ भाषा में ‘वन-वे’ के लिये ‘एक-दिशा मार्ग’ शब्द है। इसी तरह से हजारों शब्द संस्कृत के दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रचलित हैं। ‘वल्र्ड बैंक’ के लिये ‘लोक धनागार’ शब्द है। मलय भाषा में ‘व्योम यान’ के लिये ‘आकाश यान’ शब्द है। इण्डोनेशिया में हाथी के ‘गज’ शब्द है। महिला के लिए ‘विनिता’ शब्द है। शहद के लिए ‘मधु’ तथा गार्डन के लिए ‘उद्यान’ शब्द हैं। चिडिय़ाघर के लिए ‘उद्यान लोकसत्व’ है। फोटो के लिये ‘रूप’ शब्द है। इन सबसे यह ज्ञपष्ट है कि संस्कृत का केवल राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप है। इस स्वरूप को पुन: स्थापित करने के लिए आवश्यकता है एक शांत संघर्ष की ताकि भारत की यह अमूल्य निधि बची रहे।

आश्चर्य तब होता है जब हम पाते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया की भाषाओं में संस्कृत शब्द अच्छी तादाद में हैं। हाँ, मूल उच्चारण में जरूर थोड़ा-बहुत अंतर है ठीक वैसे ही है जैसे हमारे यहाँ ‘घट’ का ‘घड़ा’ बन गया। विदेशों में इतने सटीक संस्कृत शब्द हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया के बहुत से शब्दों को यदि देख लिया गया होता तो बहुत से शब्दों को गढऩे की जरूरत ही नहीं पड़ती। ‘दक्षिण-पूर्व’ दिशा के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में यह शब्द है-आखने, जो कि संस्कृत के ‘आग्रेय’ शब्द का रूप है। यदि थाई भाषा में दक्षिण-पूर्व कहना हो तो कहा जाएगा ‘आस्या आखने’ कहेंगे। बैंकाक में 9 विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से 7 के नाम संस्कृत पर आाधारित हैं और दो राजाओं के नाम पर। एक विश्वविद्यालय का नाम है-धर्मशास्त्र विश्वविद्यालय। इस विश्वविद्यालय की एक बिल्डि़ंग का नाम है-साला अनेक प्रसंग अर्थात् शाला अनेक कार्य हेतु (मल्टी पर्पज बिल्डिंग)। लाओ भाषा में ‘वन-वे’ के लिये ‘एक-दिशा मार्ग’ शब्द है। इसी तरह से हजारों शब्द संस्कृत के दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रचलित हैं। ‘वल्र्ड बैंक’ के लिये ‘लोक धनागार’ शब्द है। मलय भाषा में ‘व्योम यान’ के लिये ‘आकाश यान’ शब्द है। इण्डोनेशिया में हाथी के ‘गज’ शब्द है। महिला के लिए ‘विनिता’ शब्द है। शहद के लिए ‘मधु’ तथा गार्डन के लिए ‘उद्यान’ शब्द हैं। चिडिय़ाघर के लिए ‘उद्यान लोकसत्व’ है। फोटो के लिये ‘रूप’ शब्द है। इन सबसे यह ज्ञपष्ट है कि संस्कृत का केवल राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप है। इस स्वरूप को पुन: स्थापित करने के लिए आवश्यकता है एक शांत संघर्ष की ताकि भारत की यह अमूल्य निधि बची रहे।

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