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कविशाला संवाद 2021 : हिंदी कवी और लेखक-नीलोत्पल मृणाल!

Kavishala InterviewsKavishala Interviews October 9, 2021
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उर्दू प्यार की भाषा है 

अंग्रेजी व्यापार की भाषा है 

हिंदी व्यवहार की भाषा है!

-नीलोत्पल मृणाल 


अपने अनुभवों को लिखना कितना सहज है या कितना कठिन मुख्य रूप से अगर बात की जाए लेखक की जो शब्दों के जोर तोर से अपनी भावनाओ को लिख कर एक साधे पन्ने पर उतार देता है ,जो कभी-कबार इतिहास बन जाती हैं ,और लेखक ख्याति प्राप्त कर लेता है। एक ऐसा ही लेखक जिन्होंने अपनी पहली ही पुस्तक से साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसी बड़ी उपलब्धि को प्राप्ति कर लिया ,हम बात कर रहे हैं युवा लेखक नीलोत्पल मृणाल की जिन्होंने अपने अनुभवों को पन्नों पर समेटा और सफलता के शिखर को प्राप्त किया। उनकी पहली पुस्तक डार्क होर्से जो की २०१६ में प्रकाशित हुई upsc की तैयारी कर रहे युवाओं पर आधारित इस पुस्तक ने २०१६ में साहित्य अकादमी पुरूस्कार जीता था। 


कविशाला द्वारा आयोजित कविशाला संवाद में “हिंदी कवि और लेखक ” पर चर्चा में शामिल हुए नीलोत्पल मृणाल जी जिन्होंने कई गंभीर मुद्दों पर अपने विचार साझा किए और साथ ही हिंदी के महत्त्व और भविष्य पर अपनी बात रखी। एक युवा लेखक के तोर पर हिंदी साहित्य के प्रधानता के बारे में बताया। 


अपनी पहली ही कृति से साहित्य जगत में साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार प्राप्त कर लेना अपने आप में बहुत बड़ी बात है जो बार-बार देखन को नहीं मिलती।सर हमारे दर्शकों को बताएं आपका लेखनी के प्रति झुकाव या रुझान कैसे आया?आपने इसकी शुरुआत कैसे की बचपन से ही लिखना शुरू कर दिया या बाद में लगा कि हाँ मैं लिख सकता हूँ?


नीलोत्पल मृणाल : मैंने बचपन में कभी नहीं लिखा क्यूंकि मेरा मानना है जो बचपन लिखने लगता है वो बचपन फिर बचपन नहीं रह पाता ख़राब हो जाता है,जिसने सही मायनों में अपना बचपन जिया ही नहीं मुझे नहीं लगता कि वो आगे चल कर लिख पायेगा क्यूंकि दुनिया की कहानी को लिखने के लिए जरुरी है उसकी खुद की कहानी का होना। हांलाकि बचपन में मैं कॉमिक्स पढता था उस वक़्त की पत्रिकाओं को पढता था पर इसके अलावा बात करू अगर लिखने की तो शायद बचपन में मैंने कभी एक कविता भी नहीं लिखी होगी। फिर बाद में मैं दिल्ली आया जहाँ से upsc की तैयारी करनी शुरू की वहीं से पढ़ने-लिखने को लेकर एक गंभीरता आई ,कई विषयों को पढ़ना-लिखना शुरू किया ,तमाम विषयों पर लिखना शुरू किया जिससे अभ्यास बना और वही से सिखने की प्रक्रिया अभी तक चालू है।


सर ,upsc और साहित्य दोनों के रास्ते कहीं न कहीं अलग हैं क्या आपको लगता है कि अगर आपने अपनी upsc की उसी तैयारी को जारी राखी होती तो आपकी यात्रा अलग होती ?


नीलोत्पल मृणाल :मैं मानता हूँ लिखने के लिए जरुरी है पढ़ना जो इन्सान पढ़ेगा लिखेगा ही नहीं वो क्या लिखेगा। मैं बात करू अपनी तो मेरे लिए upsc की तैयारी करना सहायक रहा मेरी लेखनी के लिए क्यूंकि upsc का पाठ्यक्रम एक अनुशसान बनाता है ,मैंने upsc की तैयारी करना शुरू किया जिसके लिए मैंने गंभीरता से पढ़ना शुरू किया और वही से लिखते-पढ़ते आगे पढ़ा।मैंने वो न किया होता तो शायद आज के समय में मैं एक ठेकेदार होता। तो मैं मानता हूँ कि आज मैं जो हूँ,जहाँ हूँ उसमे upsc एक बड़ा योगदान है।


किताब लिखने के साथ जरुरी हो जाता है उसका किसी अच्छे प्रकाशन में प्रकाशित होना। सर आपने किन संघर्षों का सामना किया अपनी किताब को प्रकाशित करवाने में ?


नीलोत्पल मृणाल : अब से ३-४ साल पहले जब कोई मेरे से मेरे संघर्षों के बारे में पूछता था तो मैं हमेशा बढ़ा-चढ़ा कर उसकी प्रस्तुति करने का प्रयास करता था ,पर आज के वक़्त में मैं समझ चूका हूँ कि कोई भी नए लेखक जो लिख रहे हैं, सभी का संघर्ष एक सामान ही होता है।जहाँ कई लोग उस नए लेखक की लेखनी पर भरोसा नहीं करते वही ऐसे भी कई लोग होते हैं जो बेमतलब भरोसा कर लेते हैं। आज कल जहाँ सोशल मीडिया की सरलता है लोग आपको प्रेमचंद भी घोषित कर सकते हैं और कई आपको कूड़ा भी कह सकते हैं। बात करू अगर आप नए लेखक हैं तो प्रकाशक आपको दो तरह से जानेंगे या तो वो आपसे परिचित हों तो आप पर दाव खेल देंगे या तो अगर आप किसी क्षेत्र में सिद्ध है आपका उधर नाम है तब प्रकाशक आपकी किताब छापेंगे और तीसरा रास्ता है शेल प्रकाशन का तो मैंने तीनो में ही कोशिश की पर सफल नहीं हो पाया । जहाँ मैंने किताब मेलो में जा-जा कर प्रकाशकों को अपनी किताब दिखाई और छपने का आग्रह किया पर कुछ नहीं हुआ हांलाकि ये एक सामान्य प्रक्रिया है जिसका हर नए लेखक को सामना करना ही परता है। इन सभी से गुजर कर किताब छपी बिकी लोगो ने पसंद की और मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया ,जिसे मैंने एक अवसर के रूप में देखा और आगे बढ़ने का प्रसास किया। तो ये एक संघर्ष है जो मैं मानता हूँ एक मखमली संघर्ष है जो सभी को करना ही पड़ता है।


सर कई बार ये देखा जाता है कि किसी उपन्यास या किसी लेखक की कृति से कंटेंट उठा लिया जाता है ,जिसका उस लेखक को पूरा श्रेय भी नहीं दिया जाता। हालही में आई 'वेब सीरीज',Tvf एस्पिरेंट्स जिसकी बहुत सी समानताएं आपके उपन्यास 'डार्क हॉर्स' से थी इस पर आप कुछ बताएं?


नीलोत्पल मृणाल :मैं एक लेखक हूँ मेरा कुछ बोलना इस पर मैं मानता हूँ उतना परिमाणिक नहीं होगा जितना मुझे लगता है किसी दर्शक जिसने देखा पढ़ा और समझा है उसका कहना होगा। हांलाकि अगर बात है कि ऐसा हुआ तो हां ऐसा हो सकता है, किसी रचनात्मक दुनिया में इस प्रकार की झपट-मारियाँ का होना संभव है ,हांलाकि ऐसी झपट मारिओं से बचा नहीं जा सकता पर है लड़ा जरूर जा सकता है ।

सर जहाँ आज हम बात करते हैं न्यू इंडिया की,इस न्यू इंडिया में आज का युवा हिंदी साहित्य को किस तोर से देखता है? ये सवाल अहम् है क्यूंकि आज का युवा कहीं न कहीं अंग्रेजी भाषा के प्रति आकर्षित हो रहा है ऐसे में हिंदी शायद कहीं पीछे छूट रही है आपके इस पर क्या विचार हैं?


नीलोत्पल मृणाल : अंग्रेजी के आगे होने में साहित्य का कोई बड़ा महत्व नहीं है ,दोनों के सम्बन्ध अलग हैं। हिंदी का सम्बन्ध और अंग्रेजी का सम्बन्ध हमारे सामाजिक परिवेश और आर्थिक परिवेश का एक मुद्दा है, यानी हमारे आर्थिकी पर अंग्रेजी का कब्ज़ा है अंग्रेजी पढ़ कर आप पैसा कमा रहे हैं अच्छी नौकरी प्राप्त कर रहे हैं ,हिंदी एंकर के मुकाबले अंग्रेजी ऐंकर को ज़्यादा वेतन मिल रहे हैं जो मैं मानता हूँ साहित्य का मुद्दा नहीं है और इसलिए अंग्रेजी आपको आकर्षित कर रही है। हिंदी जिस दिन आपको अच्छी नौकरी देने लगेगी आपका आकर्षण ख़तम हो जाएगा तो मैं मानता हूँ कि ये मुद्दा सरकारों से ज़ुरा ज़्यादा है ,साहित्य से ज़ुरा नहीं है। हिन्दुस्तान की हुकूमत आपको आपकी भाषा में अच्छी नौकरी देती है या नहीं या हिन्दुस्तान की हुकूमत आपको आपकी भाषा में एक गरिमापूर्ण जीवन अगर आपको अपनी भाषा में ये सब मिलेगा तो मैं मानता हूँ साहित्य तो उसके रथ पर सवार होकर कहीं तक की दुरी तय कर सकता है। 




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