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निर्मल वर्मा जी की कहानियों को क्यों पढ़ना चहिए

Kavishala DailyKavishala Daily October 26, 2021
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यह एक अदृश्य आग की तरह थी जिसे हम महसूस कर सकते थे,

जो हमारे आपसी अंधकार को भेदने की कोशिश कर रही थी।

इसने मुझे चौंका दिया कि हम में से प्रत्येक दूसरे के लिए अंधेरा है।

तीन दिन या तीन साल जब तक हम अँधेरे में जलते हुए क्षण को पकड़ नहीं लेते,

तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता,

यह अच्छी तरह से जानते हुए कि यह टिकेगा नहीं और

इसके बुझ जाने के बाद हम अपने स्वयं के ठंडे एकांत में वापस आ जाएंगे।

— निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा जी हिन्दी साहित्य दौर के एक प्रमुख लेखक को हिन्दी साहित्य में नई कहानी के प्रथम अन्वेषक के रूप में देखा जाता है। और हिन्दी साहित्य के मशहूर विश्लेषक 'डॉक्टर नामवर सिंह ' ने निर्मल वर्मा जी की कहानी "परिंदे " को हिन्दी साहित्य की पहली नई कहानी मानते हैं। 

निर्मल वर्मा जी ही वो पहले लेखक थे जिन्होंने कहानियों का केंद्र सामाजिक स्थितियों से मानसिक स्थितियों की ओर बदला। उनकी कहानियां अक्सर गहराई और संवेदनशीलता के लिए भी जानी जाती है। 

निर्मल वर्मा जी का जन्म हुआ 3 अप्रैल 1929 को शिमला में हुआ और शायद यही वजह है कि उनकी कहानियों मे पहाड़ों के प्रति एक विशेष लगाव देखने को मिलता है। उनकी कहानियों में पहाड़ों का, चीर के पेड़ो का, बर्फ का, धुंध का, जिक्र अक्सर देखने को मिलता है। 

उन्होने अपना ग्रेजुएशन दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से किया। और तभी उनकी कहानियों में दिल्ली का जिक्र इस तरह से आता है जैसे उन्होने उस शहर को भरपूर जिया हो। और यह हम सभी जानते है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी शहर को कॉलेज के ही दिनो मे भरपूर जीता है। 

सन 1959 में यूरोप इंस्टीट्यूट ऑफ ओरियंटल स्टडीज में उन्हे कुछ उपन्यासों और कहानियों के हिन्दी में अनुवाद करने के लिए यूरोप में आमंत्रित किया गया और वह अगले दस सालों तक वही रहे। एक लेखक के तौर पर उनका सर्वश्रेष्ठ वक्त वही गुजरा। यूरोप में गुजारे इस लंबे वक्त का और इस संसर्ग का उनकी लेखन शैली पर प्रभाव देखने को मिलता हैं। और इसी कारणवश हिन्दी साहित्य में उन्हे एक बाहरी के तौर पर जाना जाता था - निर्मल वर्मा "द आउट साइडर ऑफ इंडिया इन लिट्रेचर "।

उनकी कहानियों में पीढ़ा, यातना, उदासी, अकेलापन, एकांत, त्रासदी, इंतजार, ये सभी शब्द बिखरे पड़े रहते हैं। उनके लिखने में एक लय है, उदासी भरी लय। जिन को पढ़ने से एक अलग किस्म की गहराई और सुकून का एहसास होता है। उनकी कहानियां पढ़ने से ऐसा लगता है, कि हम खुद से ही बात कर रहे हो। जैसे कि हम कही नीचे दब गए थे और शायद हम उस बात को भूल भी गए थे पर, उन्हे पढ़के लगता है कि हम खुद को ही हाथ पकड़ कर नीचे से ऊपर उठा रहे हो। उनकी कहानियों को पढ़ने से अपने मन में उतरने का और अंतर मन में टटोलने का मौका मिलता है। निर्मल वर्मा जी ने अकेलेपन, अलगाव और उदासी की भावना को कहानी का अहम हिस्सा बना दिया। उनके किरदार अक्सर उदासी और अकेलेपन में डूबे रहते है, इसीलिए उन्हें अकेलेपन का कवि भी बताया जाता है - निर्मल वर्मा "द पोएट ऑफ लॉनलीनेस "।

उनकी कहानियां पढ़कर हमे यह भी एहसास होता है कि, हर व्यक्ती किसी न किसी से दुखी हैं, हम सबके अपने - अपने दुख है और कोई भी दुख छोटा नहीं होता। इसीलिए हम सबको एक दुसरे के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। 

निर्मल वर्मा जी के लेखन की एक ख़ास बात ये भी है कि, उनके किरदार कभी भी बनावटी नहीं लगते। उनमें एक गहराई होती हैं। वह अक्सर खयालों में डूबे रहते हैं, और खामोश रहते है। गहरे और विचारशील मोनोलॉग उनकी कहानियों की विशेषता है। उन्हे पढ़कर आप एक खास किस्म का ठहराव और सुकून का अनुभव करेंगे। और ख़ामोशी का इतना बेहतरीन उपयोग हिन्दी साहित्य में और कही देखने को नहीं मिलेगा। उनके लेखन की एक ओर खास बात यह है कि उनके किरदारों के नाम नहीं होते।

उनका उपन्यास "वे दिन " हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास है जो यूरोप में सेट था। उसकी कहानी के केन्द्र में है एक प्रवासी भारतीय लड़का और एक ऑस्ट्रियन लड़की। और पुरी किताब में हम कभी भी लड़के का नाम नही जान पाते। 

उन्होने अपने लेखन के माध्यम से अकेलेपन से जूझते हुए बच्चो को भी दर्शाया है। उन्होंने दिखाया है कि किस तरह बड़ो की तरह बच्चे भी इस दुनियां में अकेलेपन को झेलते हैं। उनका उपन्यास "एक चिथड़ा सुख " एक बच्चे के नज़रिए से लिखा गया है। जिसे हमेशा हल्का बुखार रहता है और जो हमेशा खुद को अकेला पाता है। 

निर्मल वर्मा जी ने कहानी लेखन को बहुत गंभीरता से लिया और अपनी एक सी हस्तकला तैयार की। उनकी कहानियां एक खास बनावट लिए रहती है। शायद यही वजह थी के वह पहले ऐसे साहित्यकार थे जिन्हे, कहानियों के लिए 'साहित्य एक्डेमी पुरूस्कार' मिला। यह पुरस्कार उन्हे अपनी कहानी "कव्वे और काला पानी " के लिए 1985 में मिला। खास बात यह है कि, उनसे पहले जिन साहित्यकारों को ये पुरुस्कार मिला था उन्हे या तो उपन्यासों के लिए मिला था या कविताओं के लिए। एक कहानी कार के तौर पर जीत कर न सिर्फ उन्होने कहानी लेखन की सार्थकता सिद्ध की बल्कि, अन्य युवा साहित्यकारों को भी कहानी लेखन के लिए प्रोत्साहित किया। 

उनकी कहानियों को आज के समय इसीलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि आज जो लोग अपने घरों से इतने दूर रह रहे हैं, अपने प्रिय जनों से दूर है, या कई बार साथ रहने पर भी अक्सर लोग खुद को अकेला पाते है, उन्हे ये कहानियां पढ़कर लगता है के अकेलेपन का यह जो भाव है यह सामान्य है। और उनकी कहानियों को पढ़कर वह न सिर्फ अकेलेपन को अपनाते है बल्कि, उसके लिए सहज भी बनते हैं। 

उनकी एक कहानी "अंधेरे में " एक बच्चे के नज़रिए से लिखी है। इस कहानी में दिखाया गया है के किस तरह से बच्चे बड़ो की बातो को या उनके व्यवहार को नहीं समझ पाते है। और उनको समझने में कितनी कठिनाई होती है, और इस कारण वह खुद को अक्सर अकेला पाते है। इस कहनी की अंग्रेजी अनुवाद "अंडर द कवर ऑफ डार्कनेस " को खुशवंत सिंह जी ने अपनी किताब "बेस्ट इंडियन स्टोरीज " में भी शामिल किया है। 

उनकी एक और कहानी, "दूसरी दुनियां " एक बेरोजगार नौजवान युवा की और एक छोटी सी बच्ची की दोस्ती की है। इसमें गरीबी, बेरोजगारी, बच्चो की मासूमियत और उनके अकेलेपन को बड़े अच्छे तरीके से टटोला गया है। यह एक बहुत खूबसूरत कहानी है। 

कैसी विचित्र बात है, सुखी दिनों में हमें अनिष्ट की छाया सबसे साफ़ दिखाई देती है,

जैसे हमें विश्वास न हो कि हम सुख के लिए बने हैं।

हम उसे छूते हुए भी डरते हैं कि कहीं हमारे स्पर्श से वह मैला न हो जाए

और इस डर से उसे भी खो देते हैं,

जो विधाता ने हमारे हिस्से के लिए रखा था।

दुख से बचना मुश्किल है, प

र सुख को खो देना कितना आसान है ,

यह मैंने उन दिनों जाना था।

— निर्मल वर्मा

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