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आज 2021 में प्रेमचंद जिंदा होते तो क्या होता!

Kavishala DailyKavishala Daily October 8, 2021
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''मैं एक मजदूर हूँ। जिस दिन कुछ लिख न लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं।'

-मुंशी प्रेमचंद


कहा जाता है कि एक लेखक समय के हिसाब से परिस्थितियों का मूलयांकन कर अपने विचारों को प्रस्तुत करता है ,जहाँ हम बात करते हैं किसी विशेष काल के कलाकार की जिसने अपने समय की परिस्तितिओं पर अपनी बात लिखी जो संभवतः समय के हिसाब से धुंधलित हो गई परन्तु ऐसे भी कई साहित्यकार आए जिनकी रचनाएं उनके काल में तो प्रासंगिक थी ही परन्तु आज भी उतनी ही प्रासंगिक है ,हम बात कर रहे हैं साहित्य को एक निश्चित दिशा देने वाले लेखक मुंशी प्रेमचंद की जिनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।वे ऐसे साहित्यकार थे जिनके साहित्य को समय सीमा में बाँध पाना असंभव है। मुंशी प्रेमचंद के युग का विस्तार १८८० से १९३६ तक रहा ,ये वो वक़्त था जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था ऐसे वक़्त में प्रेमचंद की लेखनी ने भारत को स्वतंत्र करवाने की दिखा में कार्य किया। समाज की विसंगतिओं पर उन्होंने अपनी लेखनी से वार किया जहाँ किसानों की समस्यायों को करीब से देखा और संवेदनशीलता से उसे कहानियों एवं उपन्यासों में उतारा ,जो दिखाता है की प्रेमचंद वास्तव में एक जिम्मेदार व संवेदनशील लेखक थे।अगर यह कहा जाए की प्रेमचंद का साहित्य एक आम आदमी का साहित्य है तो शायद गलत नहीं होगा। आज अगर वे हमारे बिच होते तो संभवतः कार्य करते युवाओं को प्रोत्साहित करने का उन्हें दिशा दिखाने का ,सही मायनों में जीवन कैसे व्यतीत किया जाए किसी से अपेक्षा न रखते हुए व ईमानदारी को साथ रखते हुए। 

उनके साहित्य ने समाज को दर्पण दिखाने का कार्य किया हांलाकि उनके युग में आज की तरह इतने साधन उपस्थित नहीं थे परन्तु फिर भी इसका उनकी लेखनी पर कोई असर नहीं दिखा।जहाँ आज युवा सोचते हैं रातों-रात सफलता के शिखर पर पहुँच जाने की वहीँ प्रेमचंद ने आहिस्ता-आहिस्ता उस शिखर को हासिल किया उनके वयक्तित्व की चर्चा करना संभवतः इतना सरल नहीं क्यूंकि उनकी लेखनी उनके गंभीर विचारों की प्रस्तुति करती है। 

प्रेमचंद को उपन्यास का सम्राट कहा जाता है ,उनके द्वारा लिखा हर लेख समाज के भीतर एक चेतना जगाने का कार्य करता है। बात करें अगर उनके लेखनी शैली की तो उन्होंने कई विधाओं में कार्य किया,हालांकि उनकी विचारधारा गंभीर थी परन्तु उन्होंने कई मनोरंजनात्मत लेखनी भी प्रस्तुत की। 


प्रेमचंद का व्यक्तित्व 


पांवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बंधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं।

दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है। सोचता हूँ – फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी – इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खिंच जाता है।

-हरिशंकर परसाई 


प्रसिद्ध वयंकार परसाई जी द्वारा प्रेमचंद पर यह व्यंग प्रेमचंद की सादगी व सरलता दिखाता है,जिससे आज के युवा को सिखने की आवश्यकता है कि मनुष्य कितना भी उच्च दर्जे का क्यों न हो उसके लिए जरुरी है सादगी बनाये रखना। 


क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात ना कहोगे-मुंशी प्रेमचंद 

प्रेमचंद ने कहानी पंचपरमेश्वर में यह वाक्य लिखा था कि क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात ना कहोगे!प्रेमचंद एक ईमानदार इन्सान थे उनकी जीवन शैली बेहद सरल थी साथ ही अपने सन्तानो के लिए भी यही चाहते थे कि वे ईमानदारी से जीवन यापन करें। जहाँ हम आज देखते हैं किस तरह लोगो का व्यक्तित्व चंद मोल में बिक जाता है चाहे अंकित करें प्रशासन या किसी के निजी तोर पर यहाँ मुंशी प्रेमचंद से सिखने की आवश्यकता है कि बात कोई भी हो जरुरी है अपने ईमान को साथ रखने की।आज मुंशी हमारे साथ होते तो यक़ीनन युवाओं को उनका पहला सन्देश भी यही होता। 


कठिन परिश्रम का कोई तोर नहीं!

-मुंशी प्रेमचंद 

मुंशी प्रेंचन्द द्वारा लिखा गया छः शब्दों का यह वाक्य आज के युवाओं को समझना बेहद जरुरी है जहाँ सोशल मीडिया के माध्यम से या कैसे भी वे रातों-रात एक ऊँचे शिखर को हासिल कर लेना चाहते हैं व सरलता से सब प्राप्त कर लेना चाहते हैं संभवतः प्रेमचंद ने आने वाले कल को सोचते हुए ही यह बात कही होगी और कठिन परिश्रम करने का यह सन्देश दिया होगा।जहाँ आज के समय में झूठ का बोलबाला है लोग झूठ के दम पर ही शिखर की प्राप्ति करना चाहते हैं ऐसे में प्रेमचंद से समझना जरुरी है कि वास्तविकता में कठिन परिश्रम ही सुखद फल दे सकता है। 


विपत्तियाँ जीवन का विद्यालय है!

-मुंशी प्रेमचंद 

मुंशी प्रेमचंद ने विपत्तियों को जीवन का विद्यालय बताया है ,हम कई बार विपत्तियों के सामने घुटने टेक देते हैं और सोचने लगते हैं स्वयं को कोसने लगते हैं की आखिर हमारे साथ ही ऐसा क्यों हुआ ऐसे में प्रेमचंद द्वारा कही यह बात को समझना जरुरी है कि विपत्तियों से सीखें और आगे बढे,वहीं वे कहते हैं "निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है" अतः स्वयं पर भरोसा रखें और आगे बढ़ने की दिशा में चलते रहे। 

विद्वान् होने साथ साथ वयवहारिक होना भी जरुरी है!

-मुंशी प्रेमचंद 

आपके ज्ञान को सुनिश्चित करता है आपका व्यवहार जरुरी है आप न्याय सांगत व्यवहार रखें। 


चापलूसी का जहरीला प्याला आपको तब तक नहीं नुकसान पहुंचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी ना जाए!

-मुंशी प्रेमचंद 

हमारे देश में वर्षों से चापलूसी की यह परंपरा रही है जो आज भी विशेष रूप से विद्यमान है,प्रेमचंद कहते थे चापलूसी का प्याला आपको तब तक नुक्सान नहीं पहुंचा सकता जब तक आपके कान उसे अमृत समझ कर पि न लें अर्थात जो लोग चापलूसी करते हैं और जो लोग इनसे खुश भी हो जाते हैं उनके लिए ये समझना जरुरी है कि तारीफ़ की झूठी चाशनी कितनी भी मीठी क्यों न हो वो आपकी आत्मा व व्यक्तित्व को दूषित कर देता।आपके लिए जरुरी है आप जैसे हैं वैसे ही खुद को पेश करें और वास्तविकता में जियें।


ईमान - ईमानदारी ये वे दो शब्द हैं जिनपर प्रेमचंद का पूरा जीवन आधारित था।

आज वे साक्षात् हमारे बिच नहीं हैं परन्तु अगर आज २१वी सदी में वे होते तो सम्भवतः इसी विचार धारा को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य करते जैसा की लेख के शुरुआत में कहा गया है प्रेमचंद के साहित्य को समय में नहीं बाँधा जा सकता,आज भले ही २१वी सदी में जी रहे हो परन्तु उनका साहित्य आज के समय में भी उतना ही नवीन है।उनकी विचार धारा आज भी प्रेरणा देने का कार्य करती हैं युवाओ के लिए जरुरी है उनके साहित्य को जानना पढ़ना समझना एवं जीवन के मूल को ग्रहण करना।ईमानदारी की जड़ें बहुत गहरी होती हैं मनुष्य को जमीनी हकीकत से जोड़ने का कार्य करती हैं इसलिए जरुरी है ईमान को साथ रखना। 


सोने और खाने का नाम जिंदगी नहीं है, आगे बढ़ते रहने की लगन का नाम जिंदगी हैं।

-मुंशी प्रेमचंद












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