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“तमाशा सम्राज्ञी” : विठाबाई मांग नारायणगांवकर

Kavishala DailyKavishala Daily October 7, 2021
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" गाजवणारी, लावणी नृत्यांगना,

सांवला चेहरा, सुंदर गला,

महाराष्ट्र की प्रसिद्ध कलाकार तमाशा,

' तमाशा सम्राज्ञी ' मिली पदवी,

विठाबाई मांग नारायणगांवकर नाम हैं उसका । "

जुलाई 1935 से 15 जनवरी 2002 तक की एक जीवनी, जो थी महाराष्ट्र की प्रसिद्ध तमाशा परंपरा की एक बहादुर और बहुमुखी व्यक्तित्व वाली तमाशा की महारानी विठाबाई। बचपन से ही पिता के संग-संग गांव-गांव घूमकर नृत्य, संवाद शैली, गायन की शिक्षा लेने लगी। पहली मंडली ' भाऊ-बापू ' के शो में विठाबाई अपनी कला का प्रर्दशन करने लगी । फिर मामा की कला मंडली के साथ मिलकर तमाशा प्रस्तुती का अनुभव व संस्कृति का ज्ञान मिला। पढ़ाई लिखाई का ज्ञान न होने पर भी नाटय शास्त्र, अभिनय को व्यक्त करना शुरू कर दिया।

उनके जीवन की वो 'घटना' जिसकी वजह से उनकी पहचान बनी :-

अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए उसके मामा ने उसकी शादी करदी। परन्तु, शादी के बाद उनका पति उन्हे पीकर मारा करता था। तमाशा प्रोग्राम बुक कर, पैसे कमाकर लाने को कहता था। यहां तक कि जब वह गर्भवती थी तो भी नाचने पे मजबूर किया करता था।

ऐसे ही चलते हुए, एक बार जब वह नौ महीने की गर्भवती थी उन्हे स्टेज शो करने पे मजबूर किया। उस प्रोग्राम के दौरान लावणी करते हुए उन्हे अचानक बहुत तेज़ दर्द उठा। तब अपनी बेटियों को शो जारी रखने का कहकर वह ग्रीनरूम में चली गई। वहा बिना किसी डॉक्टर या दाई के, अकेले ही उन्होंने अपने लड़के को जन्म दिया। अपनी साड़ी का कुछ कपड़ा फाड़ कर बच्चे को लपेटा और गर्भनाल को पास पड़े पत्थर से काटा। और फिर से दुबारा साड़ी लपेट कर मात्र 15 मिनट में स्टेज पर शो जारी रखने आगई, जिसे देख दर्शको ने उसकी हिम्मत व कला को सराहा। इस तरह उनके अंदर के कलाकार ने उन्हें जिंदा रखा, और इस कठिनाई का सामना करने की हिम्मत दी।

'तमाशा कलाकार' होते हुए भी 'नारी-सशक्तिकरण' उदाहरण :-

उन्होंने अपनी बेटियों के साथ कई नाटक किए, गाने बनाए। और हमेशा अपने दर्शको से जुड़ी रहीं। वह अपने दर्शको की इज्ज़त करती थी और दर्शक भी उनकी उतनी ही इज्ज़त करते थे।

परन्तु, एकबार उनकी बेटी शिकायत लेकर आई कि कुछ दर्शक मिलकर उस पर पत्थर फेंक रहे हैं। तब विठाबाई ने उसे समझाया कि ' ये हमारे दर्शक है, ये प्यार दे या पत्थर हमें स्वीकार करना चाहिए '। फिर स्टेज पर जाकर उन्होंने दर्शको से कहा - ' हम कलाकार और दर्शकों के बीच इज्ज़त का समान लेन-देन होना चाहिए '। फिरभी, वो पत्थर फेंकने वाले विरोध करने लगे तो उनको ताना मारते हुए बोली कि ये पत्थर हमें छू तो सके तुम तो उस लायक भी नहीं, यह सुनकर एक व्यक्ति इस बात को अपना अपमान समझते हुए विठाबाई कि बेटी की तरफ बढ़ा तो विठाबाई ने उसका कॉलर पकड़ उसे स्टेज से उतार निकाला।

उपलब्धियां :-

विठाबाई ने कई केंद्रीय, स्टेट गवर्नमेंट अवॉर्ड जीते और अपनी प्रतिभा व शक्सियत से उन्हें अपने गांव का नाम रोशन किया। उनका गांव उनके नाम से जाना गया। विठाबाई पुणे में आयोजित अखिल भारतीय तमाशा परिषद् की अध्यक्ष बनी। 1990 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा ' महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार ' से भी सम्मानित हुई। उन्हें भारत सरकार प्रतिष्ठित संगीत नाटक एकेडमी पुरुस्कार मिला व राष्ट्रपति पुरुस्कार भी मिला।


नारायणगांव उन्हें हमेशा "तमाशा सम्राज्ञी विठाबाई " के नाम से हमेशा याद करते रहेंगे।

एवम्, उनकी यह कहानी जिस-जिस महिला तक पहुंचेगी उसे हिम्मत व हौसला प्रदान करती रहेगी।

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