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सर्वोदय दर्शन – जयप्रकाश नारायण के विचार

Kavishala DailyKavishala Daily October 11, 2021
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“ मेरी दिलचस्पी सत्ता पर कब्जा करने में नहीं है,

बल्कि लोगों द्वारा सत्ता के नियंत्रण में है। “

- जयप्रकाश नारायण

स्वतंत्रता संग्राम में हमें बहुत से नेता मिले, जिनके प्रयासों के कारण ही यह देश आज आजाद है। उन्हीं में से एक राजनैतिक नेता थे - ‘ जयप्रकाश नारायण ‘। जिन्हें हम लोकनायक भी कहते हैं। आज उनके जन्मदिवस पर, उनके द्वारा किए गए एक ऐसे आंदोलन को याद करते हैं जिसको शामिल होते हुए उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया वह था “सर्वोदय आंदोलन”।

सर्वोदय दर्शन – जयप्रकाश नारायण के विचार

“सर्वोदय का अर्थ है, सभी का कल्याण।“ यह वह आंदोलन है, जिसका लक्ष्य ग्रामीण पूर्ण निर्माण, शांतिपूर्ण और सहकारी माध्यमों से ग्रामीण भारत के लोगों को ऊपर उठाना है।

जयप्रकाश नारायण की पहचान एक ऐसे राजनेता व राजनीतिक चिंतन के रूप में की जाती है, जिन्होंने सर्वोदय के विचारों का प्रबल समर्थक किया है। इस संबंध में उनका कहना था, कि समाज के प्रत्येक समूह के उत्थान के बिना विकास की बात नहीं की जा सकती।

उन्होंने समाजवाद को सर्वोदय के रूप में बदलने की बात कही। उनका कहना था कि समाजवाद के प्रमुख लक्ष्य स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को हासिल करने के लिए सर्वोदय के साथ जोड़ना बहुत जरूरी है। इसके बिना समाजवादी लोकतंत्र का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

गांधी जी व उनके प्रिय शिष्य आचार्य विनोबा भावे सर्वोदय सिद्धांत पर विस्तृत कार्यक्रम कर रहे थे। जिससे जयप्रकाश नारायण जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने विनोबा भावे की तरफ अपने योगदान के लिए हाथ बढ़ाया।

सर्वोदय को आगे बढ़ाने के लिए विनोबा भावे ने ‘ भूदान ग्राम दल ‘ का साथ दिया। 1953 में बोधगया सर्वोदय सम्मेलन में जयप्रकाश जी ने अपने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर भूदान आंदोलन से जुड़ने का फैसला लिया और यहीं से उनकी सर्वोदय यात्रा शुरू हुई, जो 22 वर्ष तक सक्रिय रही। सर्वोदय के दर्शन को उदय करने में जयप्रकाश नारायण जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

गांधीजी का मानना था, कि गरीब तथा नीर्बलो को भौतिक उत्थान की आवश्यकता है। तो पूंजीपतियों को आध्यात्मिक उत्थान की आवश्यकता है। जय प्रकाश जी यह मानते थे कि समाज में दोनों वर्गों में लाया गया बदलाव अस्थाई होता है, उसका परिणाम सुखद नहीं हो सकता। जब तक सभी का उत्थान नहीं होगा, तब तक राज्य व समाज को सशक्त नहीं बनाया जा सकता। वह समाज की स्थापना राज्य के सहयोग से नहीं करना चाहते थे। वह आपसी सहयोग से समाजवाद की स्थापना करना चाहते थे। उस समाजवाद को जनता का समाजवाद कहा जाएगा।

जयप्रकाश जी ने कहा भूदान आंदोलन साधारण दिखता होगा, परंतु यह वास्तव में चारों ओर से सामाजिक तथा मानवीय क्रांति का प्रभाव है। सर्वोदय के माध्यम से समाज में भी बदलाव लाया जाएगा।

सर्वोदय समाज की स्थापना की दिशा में ग्राम स्वराज्य आखिरी कोशिश है। ग्राम स्वराज्य पंचायत नहीं है, बल्कि यह स्वविकसित से आत्मनिर्भर तथा पूर्ण सत्ता संपन्न ग्रामीण इकाई है। जब तक समाजवाद को सर्वोदय के रूप में परिवर्तित नहीं किया जाता है, तब तक समानता, स्वतंत्रता, बंधुता व शोषण से मुक्ति के उद्देश्यों को हासिल नहीं किया जा सकेगा।

इस तरह उन्होंने राजशक्ति की जगह लोकशक्ति की स्थापना का समर्थन किया। जिससे समाजवाद को सशक्त बनाया जा सकता है।

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