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विख्यात कवि अनवर मसूद

Kavishala DailyKavishala Daily November 8, 2021
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क्लरकों की सभी मेज़ों पे 'अनवर' 

हर इक फ़ाइल मज़े से सो रही है 

अगरचे काम सारे रुक गए हैं 

मगर मीटिंग बराबर हो रही है

-अनवर मसूद


आसमाँ अपने इरादों में मगन है लेकिन आदमी अपने ख़यालात लिए फिरता है ,इंसानो की फ़ितरत की आसमान से तुलना करने वाले पकिस्तान के प्रख्यात कवि अनवर मसूद का जन्म आज ही के दिन १९३५ में को पंजाब प्रांत के गुजरात शहर में हुआ(जो अब पाकिस्तान में है)। मसूद साहब अधिकतर व्यंग्य कविता (मज़ाहिया शायरी) लिखतें हैं और अपनी पंजाबी की व्यंग्य कविताओं के लिए जाने जाते हैं जो की भारत-पाक सीमा के दोनों तरफ़ के पंजाब में अत्यंत लोकप्रिय हैं। उन्होंने रोजमर्रा की चीज़ों से लेकर सरकारी कामकाज के ढीले पन सभी पर अपनी व्यंग शैली से लिख कर वार किया है। हांलाकि उन्होंने कई विधाओं में लेखन कार्य परन्तु प्रसिद्धि उन्हें मुख्य रूप से हास्य लेखनी से मिली। प्रसिद्ध शायर अनवर मसूद का जन्म ८ नवम्बर १९३५ को पंजाब प्रांत के गुजरात शहर में हुआ (जो कि अब पाकिस्तान में है)। उनके जन्म के बाद, १९४१ में, उनका परिवार लाहौर में जा बसा जहाँ से मसूद साहब ने अपनी प्राथमिक पढ़ाई पूरी की। १९४७ में गुजरात वापिस आकर अपनी पब्लिक स्कूल में शेष विद्यालय की कक्षाएं पूर्ण कीं। गुजरात में ही स्थित ज़मीन्दारा कालेज से बी॰ए॰ उत्तीर्ण की। जिसके बाद पास ही के शहर कुंजा में स्थित सरकारी इस्लामिया हाइ स्कूल में अध्यापन कार्य प्रारम्भ कर दिया। १९६२ से १९६६ तक मसूद साहब ने पाकिस्तान के विभिन्न कालेजों में पढ़ने का कार्य किया। अज्ज की पकाइए? ग़ुंचा फिर लगा खिलने ,बनियान ,अम्ब्री उनकी कुछ प्रसिद्द रचनाएं हैं।

अनवर मसूद की कुछ बेहतरीन रचनाएं आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। 


कब तलक यूँ धूप छाँव का तमाशा देखना 

धूप में फिरना घने पेड़ों का साया देखना 


साथ उस के कोई मंज़र कोई पस-ए-मंज़र न हो 

इस तरह मैं चाहता हूँ उस को तन्हा देखना 


रात अपने दीदा-ए-गिर्यां का नज़्ज़ारा किया 

किस से पूछें ख़्वाब में कैसा है दरिया देखना 


इस घड़ी कुछ सूझने देगी न ये पागल हवा 

इक ज़रा आँधी गुज़र जाए तो हुलिया देखना 


खुल के रो लेने की फ़ुर्सत फिर न उस को मिल सकी 

आज फिर 'अनवर' हँसेगा बे-तहाशा देखना

-अनवर मसूद


आस्तीनों की चमक ने हमें मारा ‘अनवर’

हम तो ख़ंजर को भी समझे यद-ए-बैज़ा होगा

-अनवर मसूद


दिल सुलगता है तिरे सर्द रवय्ये से मिरा

देख अब बर्फ़ ने क्या आग लगा रक्खी है

-अनवर मसूद


सिर्फ़ मेहनत क्या है ‘अनवर’ कामयाबी के लिए

कोई ऊपर से भी टेलीफ़ोन होना चाहिए

-अनवर मसूद

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