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प्रसिद्ध राजस्थानी लघु कथाकार विजयदान देथा उर्फ 'बिज्जी'

Kavishala DailyKavishala Daily November 10, 2021
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'मृत्यु तो जीवन का श्रृंगार है। यह न हो तो कैसे काम चले? सोचो,मेरे सारे पुरखे आज जिंदा होते तो क्या होता? मेरे बारे में भी जो लिखना पढ़ना है पहले ही लिख के मुझे पढ़ा दो। अपने मरने के बाद मैं कैसे पढ़ पाउंगा?' 

-विजयदान देथा  


हम सभी जानते हैं कि भारत विविधताओं वाला देश है जहाँ की सुंदरता उसकी विविध संस्कृति ,बोली और भाषा है। जैसा की हमारे संविधान के अनुसार २३ भाषाएं बोली समझी जाती हैं लेकिन समझने वाली बात यह है कि इस विविधताओं वाले गणराज्य में कई लोक भाषाएं बोली व समझी जाती हैं। जिनके अपने महत्त्व हैं जैसा की कहा जाता है किसी भी संस्कृति की पहली पहचान होती है उसकी भाषा ऐसे में आवश्यकता है इन बोलिओं को विश्वस्तर पर पहचान दिलाने की इनके लोकगीत ,कहानियां ,कविताओं और साहित्य को समझने की। हांलाकि ऐसे कई साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने अपनी भाषा या बोली के लिए अपना अतुल्य योगदान दिया है। अपनी सांस्कृत कला को विश्ववयापी बनाने का बीड़ा उठाया है। आज हम एक ऐसे ही महान साहित्यकार की बात करने जा रहे हैं राजस्थान के प्रसिद्ध लेखक और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित विजयदान देथा  जिन्हें 'बिज्जी' के नाम से भी जाना जाता है आज इनकी पुण्यतिथि है। राजस्थान साहित्य को आगे बढ़ाने में इनका श्रेष्ठम योगदान रहा है वहीं उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं को पहचान और आधुनिक स्वरूप प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई थी।बिज्जी ने अपने जीवन में ८०० से अधिक लघु कथाएं लिखीं, जिनका अंग्रेजी के साथ कई अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया है। बिज्जी ने कोमल कोठारी के साथ रूपायन संस्थान की स्थापना की, जो राजस्थानी लोकगीत, कला और संगीत की संरक्षक संस्था थी। उनके द्वारा लिखित साहित्यिक कृतियों में ‘बातां री फुलवारी’ भी शामिल है, जो १४ खंडों में प्रकाशित हुईं। यह राजस्थान की बोलियों और लोककथाओं पर आधारित है। इसके दसवें खण्ड को भारतीय राष्ट्रीय साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया, जो अभी तक किसी भी राजस्थानी कृति को मिला पहला पुरस्कार है।


उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण थी उनकी संस्कृति उनका गाँव और उनका राज्य राजिस्थान। साहित्यकार विजयदान देथा का जन्म १ सितंबर, १९२६ को जोधपुर स्थित बोरूंदा नामक गांव में हुआ था। बिज्जी राजस्थान के चरण समुदाय ​से आते हैं।उनके पिता सबलदान देथा और दादा जुगतिदान भी प्रसिद्ध राजस्थानी कवि हुआ करते थे।महज़ चार वर्ष की उम्र में बिज्जी ने अपने पिता को खो दिया परन्तु न कभी उन्होंने अपना गांव छोड़ा, न अपनी भाषा। अपना सम्पूर्ण जीवन उन्होंने लेखन कार्य में बिताया। उनकी लिखी हुई कहानियों पर 'दुविधा' और 'परिणति' जैसी फिल्में बन चुकीं है। हबीब तनवीर का प्रसिद्ध नाटक 'चरणदास चोर' उन्हीं की कहानी पर आधारित है। 'दुविधा' कहानी पर २००५ में अमोल पालेकर ने शाहरुख खान और रानी मुखर्जी को लेकर 'पहेली' फिल्म बनाई थी। २०११ में रवींद्रनाथ टैगोर के बाद राजस्थानी लोकगीतकार बिज्जी ही भारतीय उपमहाद्वीप के एकमात्र ऐसे लेखक हैं जिन्हे साहित्य में प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था।अपने दिए योगदान के लिए बिज्जी को कई उल्लेखनीय सम्मान मिले जिनमे २००७ में पद्मश्री ,२००२ में बिहारी पुरस्कार ,१९७४ में साहित्य अकादमी अवॉर्ड(राजस्थानी) ,१९९२ में भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार ,१९९५ में मरुधारा पुरस्कार ,२००६  में साहित्य चूड़ामणि पुरस्कार ,२०११ में मेहरानगढ़ संग्रहालय ,२००२ में राजस्थान रत्न अवॉर्ड शामिल हैं। 

राजस्थान के इस लोकप्रिय साहित्यकार विजयदान देथा का  १० नवंबर,  २०१३ को ८७ वर्ष की अवस्था में निधन हुआ।उनकी लिखी कहानियां घर-घर में सुनाई जाती हैं उनके दिए योगदान के लिए साहित्य जगत में उनका नाम गौरव से लिया जाएगा वहीं अपनी राजस्थानी साहित्य को अपने समर्पण के लिए उन्हें सदैव याद किया जायेगा।  

विजयदान देथा उर्फ़ बिज्जी की कुछ रचनायें आपके समक्ष प्रस्तुत हैं :

[मेरे रोम-रोम में ऊषा छाई!]

मेरे रोम-रोम में ऊषा छाई!

सकल विश्व देखा करता है

असीम अम्बर के मानस पर छाकर

रजनी की श्यामल चादर को दूर हटा

ऊषा ! कोमल किसलय पातों को

सागर सरिता की चंचल लहरों को

वायु को रेशा-रेशा उज्ज्वल कर

समूची जगती का कण-कण

करती है ज्योतिर्मय!


फिर क्योंकर न हो

मुझको भी यह विश्वास अरे

कि मेरे युग-युग से घन आच्छादित

गहन अन्तरतम को आलोकित कर

ऊषा प्रेम-प्रकाश फैलाएगी!

इतनी तो मुझ को भी

दी मधुर आशा दिखलाई!


मेरे रोम-रोम में ऊषा छाई!


[क्या यह आमन्त्रण गान सुनाया?]

ऊषे!

तुम्हीं ने... बोली री

क्या यह आमन्त्रण गान सुनाया?


मेरे तमिस-जीवन के

चिर सहचर प्रियतम को

देकर सब दुखमय जीवन का भार!


निद्रा के अदृश्य अपरिमित पट पर

देख रहा था होकर निमग्न

बस केवल तेरा ही

सुखमय सुन्दर स्वप्न!


चढ़कर उस स्वप्न-विहग की पाँखों पर

तुम्हें पाने की सुमधुर आशा में

उड़ रहा था गति सत्वर से

फर-फर कर मर-मर

होकर विह्नल-सा अति आकुल!


पर जाग रे जाग उठ.... ओ नादान युवक

स्वप्न का संसार त्याग

अम्बर के पट पर कर ले

सचमुच की ऊषा का दर्शन!

अरुण शिखी के

इस मधुर-मधुर कलरव में

मेर इस दीन दशा पर करुणा कर

किसने यह शुभ सन्देश दिया?


ऊषे!

तुम्हीं ने .... बोली री

क्या यह आमन्त्रण गान सुनाया ?


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