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विख्यात इतिहासकार पद्मश्री योगेश प्रवीण - एक परिचय

Kavishala DailyKavishala Daily October 28, 2021
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लखनऊ है तो महज गुंबद ओ मीनार नहीं 

सिर्फ एक शहर नहीं कूच ओ बाजार नहीं 

इसके आंचल में मुहब्बत के फूल खिलते हैं 

इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं

-योगेश प्रवीण


डॉ. योगेश प्रवीण अवध और विशेष रूप से लखनऊ के इतिहास और संस्कृति के एक भारतीय लेखक और विशेषज्ञ थे। उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से साहित्य में डॉक्टरेट के अलावा हिंदी और संस्कृत में परास्नातक किया था। उन्हें 'इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ लखनऊ' के नाम से भी जाना जाता था। 2003 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए योगेश प्रवीण को भारत का अत्यधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार पद्म श्री से नवाज़ा जा चूका है। 


कैसे हुआ इतिहास की तरफ रुख :

अपने एक इंटरव्यू में योगेश बताते हैं कि एक बार किसी शहर घूमने गए तो वहां अलग-अलग शहरों का बखान किया जा रहा था। जिनमे सबसे खराब बखान लखनऊ का था। क्यूंकि वह स्वयं लखनउ से थे इस लिहाज़ से उनको इसका और अफसोस हुआ। उन्होंने सोचा जिस शहर में पहली कहानी लिखी गई.. रानी केतकी की कहानी। जहां पहली नृत्य नाटिका लिखी गई .. इंद्रसभा.. जहां लखौरी की छोटी ईंटों से इमामबाड़ा बना दिया गया.. उसका बखान तो सबसे बढ़िया होना चाहिए। बस यही सोचकर शहर के बारे में लिखना शुरू किया और ऐसा लिखा कि प्रेसिडेंट अवार्ड और पदम्श्री मिला। लोगों ने उन पर पीएचडी की। देश-दुनिया से आज भी जो सैर करने आता है वह लखनऊ को योगेश प्रवीण की नजर से देखता है।


माँ से मिली लेखनी के प्रति प्रेरणा :

प्रवीण के पिता एक लेक्चरर थे और मां प्रिंसिपल थी और साथ कहानियां भी लिखती थीं। योगेश वियान के छात्र थे। उनका मेडिकल में सिलेक्शन भी हो गया था जिसके बाद एक साल डॉक्टरी की पढ़ाई पर फिर तबीयत खराब हो गई और ऐसी खराब हुई कि चार-पांच साल वो कुछ ना कर पाए। जब स्वस्थ्य बेहतर हुआ तो जमाना बीत गया था। घर में उनकी शादी की बात चल रही थी वह भी अधूरी रह गई। लोग, रिश्तेदार समाज वाले ताने देने लगे कि घर कैसे बसेगा? जिंदगी कैसे चलेगी। इस पर उनकी माँ सबको जवाब में जौक का शेर सुना देतीं कि रहता सुखन से नाम कयामत तलक है जौक...औलाद से तो है यही दो पुश्त चार पुश्त!!

 यानी आप जो लिखेंगे-पढ़ेंगे वह हमेशा आपका नाम जिंदा रखेगा, आपकी संतान तो दो पीढ़ी या चार पीढ़ी तक ही याद रखेगी।

अपनी माँ की इस बात का उनके मन पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा। बाद में कहानियां और कविताएं लिखना शरू किया और अधूरी पढ़ाई भी पूरी की। हिंदी और संस्कृत में। डबल एमए किया। 


उमराव जान की कब्र की की थी खोज :

इतिहासकार डॉ योगेश प्रवीण ने लखनऊ को विश्व स्तर पर एक अलग पहचान दिलाने का कार्य किया है। उनकी लिखी पुस्तक लखनऊनामा ने दुनिया को लखनऊ की कला और संस्कृति से रूबरू कराया है। 

लखनऊ की धरोहरों से ख़ास लगाव रखने वाले योगेश प्रवीण ने ही उमराव जान की कब्र खोज की थी , जो तालकटोरा में स्थित है। ऐसा करने वाले वे पहले इतिहासकार बने थे। 


किताबों के अलावा उन्होंने कविता भी प्रकाशित की। उन्हें उनकी पुस्तक 'लखनऊ नामा' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें यू.पी. सहित कई अन्य पुरस्कार मिले थे। रत्न पुरस्कार (2000), राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार (1999), यश भारती पुरस्कार (2006), और यू.पी. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1998)। उन्होंने फिल्म जुनून के लिए गीत भी लिखे। फिल्म जुनून में गीतकार होने के अलावा, दोनों फिल्मों में (1982) और (2007) में उमराव जान के नाम से उनका सहयोग लिया।


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