नव भारत, फिर चीर युगों का तमस आवरण | पंत's image
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नव भारत, फिर चीर युगों का तमस आवरण | पंत

Kavishala DailyKavishala Daily May 20, 2022
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बात उस समय की है जब छायावादी कवियों का दौर चल रहा था। छायावाद हिंदी साहित्य में romantic उत्थान की वो काव्य धारा है जिसने हिंदी में खड़ी बोली कविता को पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित किया। 

इसी दौर ने एक ऐसे कवि को उभारा जिसकी कविताएं आप सब ने अपने जीवनकाल में कभी ना कभी तो ज़रूर सुनी होंगी। सुमित्रानंदन पंत। 

रवींद्रनाथ टैगोर और पश्चिमी साहित्य के romantics से प्रभावित होकर पंत ने अपनी कविताएं लिखने की शुरुआत की थी। 

कौसानी बागेश्वर में जन्मे सुमित्रानंदन पंत की लिखी कविताएं देश प्रेम और उसके प्रति मन में बसे लगाव के लिए हुआ करती थी। भारत के कई कवि/कवियेत्रीओ की तरह उन्होंने भी कलम को आज़ादी का एक ज़रिया बनाया था। 

नव भारत,

फिर चीर युगों का तमस आवरण,

तरुण अरुण सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन!


15 अगस्त 1947: एक बेहतरीन कविता जो आज़ादी के वक्त पंत ने लिखी थी। 

छोड़ ड्रमों की मृदु छाया, स्त्री, प्रथम रश्मी और जाने कितनी ही और कविताएं हैं जो पढ़के यह लगता है की ऐसा लिखने वाला तो शायद ही होगा कहीं। 

समय के साथ-साथ पंत की कविताओं का स्वर भी बदलता रहा। वह कभी भी वर्तमान स्थितियों को झुठलाते नहीं थे बल्कि उसके बारे में लिखकर समय के साथ ही चलते थे। उनकी इसी खूबी और लिखने के एक अलग अंदाज के चलते उन्हें पद्म भूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया।

उनकी शुरुआती कविताएं प्रकृति, सौंदर्य और प्रकृति प्रेम से ही छायावादी कविताओं का अस्तित्व था। 

धीरे-धीरे प्रेम और मोह की कविताएं छोड़ कर उनकी कविताओं ने एक दूसरा रुख लिया। वह शोषण और समाज में हो रही गलत चीज़ों का विरोध करते थे। 

लिखते-लिखते पंत ने हर उस चीज़ के ऊपर लिखा जिस पर बात करना एक आवश्यकता थी। उनके काव्य विकास का अंतिम पड़ाव तब आया था जब नव - मानवतावादी युग का आरंभ हुआ था। इस युग में कवि ने नव मानवता का संदेश सुनाया था। 

पंत को कोमल कल्पना का कवि माना जाता था। उस नाम को लोग कैसे भूले जिसने ऐसी कविताओं का समा बांधा था की सबका दुनिया को देखने का नज़रिया ही बदल कर रख दिया था।

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