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होली की ठिठोली - दुष्यंत कुमार

Kavishala DailyKavishala Daily March 18, 2022
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दुष्यंत कुमार TO धर्मयुग संपादक:


पत्थर नहीं हैं आप तो पसीजिए हुज़ूर ।

संपादकी का हक़ तो अदा कीजिए हुज़ूर ।


अब ज़िंदगी के साथ ज़माना बदल गया,

पारिश्रमिक भी थोड़ा बदल दीजिए हुज़ूर ।


कल मयक़दे में चेक दिखाया था आपका,

वे हँस के बोले इससे ज़हर पीजिए हुज़ूर ।


शायर को सौ रुपए तो मिलें जब ग़ज़ल छपे,

हम ज़िन्दा रहें ऐसी जुगत कीजिए हुज़ूर ।


लो हक़ की बात की तो उखड़ने लगे हैं आप,

शी! होंठ सिल के बैठ गए ,लीजिए हुजूर ।


धर्मयुग सम्पादक (धर्मवीर भारती) TO दुष्यंत कुमार:


जब आपका ग़ज़ल में हमें ख़त मिला हुज़ूर ।

पढ़ते ही यक-ब-यक ये कलेजा हिला हुज़ूर ।


ये "धर्मयुग" हमारा नहीं सबका पत्र है,

हम घर के आदमी हैं हमीं से गिला हुज़ूर ।


भोपाल इतना महँगा शहर तो नहीं कोई,

महँगी का बाँधते हैं हवा में किला हुज़ूर ।


पारिश्रमिक का क्या है बढ़ा देंगे एक दिन,

पर तर्क आपका है बहुत पिलपिला हुज़ूर ।


शायर को भूख ने ही किया है यहाँ अज़ीम,

हम तो जमा रहे थे यही सिलसिला हुज़ूर ।



(उपरोक्त दोनों ही ग़ज़लें 1975 में ’धर्मयुग’ के होली-अंक में प्रकाशित हुई थीं।)



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