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गोपाल दास नीरज जी सिर्फ साहित्यकार ही नहीं

Kavishala DailyKavishala Daily January 6, 2023
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मे जिन सहितेयकारो की कविताएँ, कहानियां पसंद आती है जिनसे हमे जीवन का मोल पता चलता है उन्ही में एक मशहूर साहित्यकार हमारे गोपाल दास नीरज भी थे। गोपाल दास नीरज जी सिर्फ साहित्यकार ही नहीं बल्कि शिक्षक, एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक और फ़िल्मों के गीत लेखक थे। गोपाल दास नीरज जी ने अपनी ज़िंदगी में बहुत संघर्ष किये तब जाकर उन्हें ये मकाम हासिल हुआ। और आप को बता दें की उनका जन्म 4 जनवरी 1925 को ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध, जिसे अब उत्तर प्रदेश के नाम से जाना जाता है, में इटावा जिले के ब्लॉक महेवा के निकट पुरावली गाँव में बाबू ब्रजकिशोर सक्सेना के यहाँ हुआ था। 6 साल की उम्र में उनके पिता का साया उनके सर से चला गया, लेकिन गोपाल दास नीरज जी उस उम्र भी मानसिक तोर पर कमज़ोर नहीं हुए और इसे स्वीकार कर अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने की और चल पड़े। 1942 में एटा से हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की। उन्होंने टाइपिस्ट का काम यही नहीं बल्कि दिल्ली सफाई विभाग और बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी में पाँच वर्ष तक टाइपिस्ट का काम किया। और यही नहीं उन्होंने कानपुर के डी०ए०वी कॉलेज में क्लर्की की। पर उन्हें अपने शिक्षा को और बढ़ाया और प्राइवेट परीक्षाएँ देकर 1949 में इण्टरमीडिएट, 1951 में बी०ए० और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिन्दी साहित्य से एम०ए० किया। ये सभी सफलताएं उन्होंने अपने काम के साथ प्राप्त की मेरठ कॉलेज ,मेरठ में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया किन्तु कॉलेज प्रशासन द्वारा उन पर कक्षाएँ न लेने व रोमांस करने के आरोप लगाये गये जिससे कुपित होकर नीरज ने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद वे अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हो गये और मैरिस रोड जनकपुरी अलीगढ़ में स्थायी आवास बनाकर रहने लगे।

कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को बम्बई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में नई उमर की नई फसल के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा।

किन्तु बम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका मन बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये।

पद्म भूषण से सम्मानित कवि, गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने दिल्ली के एम्स में 19 जुलाई 2018 की शाम लगभग 8 बजे अन्तिम सांस ली।

अपने बारे में उनका यह शेर आज भी मुशायरों में फरमाइश के साथ सुना जाता है:

इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।

न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥

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