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सी.वी. रमन : एक आविष्कारक खोजकर्ता वैज्ञानिक

Kavishala DailyKavishala Daily November 7, 2021
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जो काम आपके सामने है,

उसे पूरी हिम्मत और लगन से करें ,

तो सफलता आपके पास जरूर आएगी।

— चंद्रशेखर वेंकट रमन

आज हम बात करने जा रहे हैं भारत के प्रसिद्ध फिजिसिस्ट, सी.वी. रमन के बारे में। जिन्होंने गुलाम भारत में जन्म लेने के बावजूद अपनी काबिलियत के दम पर न सिर्फ भारत में बल्कि, पूरी दुनिया में नाम कमाया। उनके द्वारा किया गया एक शोध - 'रमन इफेक्ट ' या 'रमन स्कैटरिंग ' आज दुनिया भर की विज्ञान की किताबों में मौजूद है। जिसके लिए 1930 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 

सी.वी. रमन का जन्म 7 नवंबर 1888 को तमिलनाडु के, तिरुचिरापल्ली में हुआ था। जो उस समय मद्रास प्रेसिडेंसी का था। उनका पूरा नाम चंद्रशेखर वेंकट रमन था। उनके पिता विज्ञान के लेक्चरर थे। जिन्होंने बचपन से ही विज्ञान के बारे में बहुत कुछ बताया था। सी.वी. रमन जी बचपन से ही बड़े जिज्ञासु स्वभाव के थे। हमारे आस-पास जो भी चीजें होती हैं, वह कैसे होती हैं? और क्यों होती हैं? यह जानने की हमेशा उत्सुकता रहती थी। और यह जागरूकता उनके मन में बुढ़ापे में भी उतनी ही थी, जितनी कि बचपन में थी। 

बचपन में उनके पिता उनके सवालों के जवाब देते थे और उन्हें ज्यादा से ज्यादा विज्ञान के बारे में बताते थे। यूं कह लीजिए, कि सी.वी. रमन (वैज्ञानिक) के पहले गुरु उनके पिता ही थे। जब वह कॉलेज में गए, तो उन्होंने कई तरह के शोध किए और रिसर्च पेपर लिखे। मगर वहां मौजूद अंग्रेज प्रोफेसर ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया। उन्हें इस बात का एहसास होने लगा था, कि भारत के गुलाम होने की वजह से यहां पर किसी सामान्य इंडियन के द्वारा कोई रिसर्च करना या लोगों तक अपने शोध को पहुंचा पाना बहुत कठिन है। इसलिए वह सरकारी नौकरी में आने की कोशिश करने लगे। "फाइनेंशियल सिविल सर्विस एग्जाम " में उन्होंने पास कर लिया और सबसे कम उम्र के "असिस्टेंट अकाउंटेंट जनरल " बने। उसके बाद उन्होंने लोकसुंदरी अम्मल से 1960 में शादी कर ली। उनके दो लड़के थे - चंद्रशेखर और राधाकृष्णन। 

उन्होंने नौकरी के साथ-साथ रिसर्च करना भी शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि बढ़ती गई और खेल कोटा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर की नौकरी का ऑफर दिया। अपनी वर्तमान नौकरी से कम तनख्वा होने के बावजूद, उन्होंने बड़ी खुशी से इस ऑफर को स्वीकार भी कर लिया। उन्होंने "समुद्र का रंग नीला क्यों?" होता है इस पर उन्होंने शोध करना शुरू कर दिया और कई सालों चले इन शोधों का परिणाम दुनिया के सामने आया। जिसमें 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलुरु' के डायरेक्टर पद को पाने वाले सी.वी. रमन पहले भारतीय थे। वरना इसके पहले, वहां सिर्फ ब्रिटिश डायरेक्टर होते थे। उन्होंने वहां पर पहली बार डिपार्टमेंट बनाया। अपने रिटायर होने के दो साल पहले, 1940 में उन्होंने स्वतंत्र होकर रिसर्च करने के लिए "रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट " की स्थापना कि। उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 

अपनी लैब में काम करते समय एक दिन वह बेहोश हो गए, उनके दिल में कुछ परेशानी आ गई थी। उस समय तो उनको बचा लिया गया। परन्तु, डॉक्टर ने कहा कि उनके पास गिनती के कुछ ही दिन बचे हैं। उन्होंने हॉस्पिटल में रहने से इंकार कर दिया, क्योंकि वह अपने आखिरी दिन अपनी इंस्टिट्यूट में बिताना चाहते थे। अपने काम को लेकर वह कितने समर्पित थे इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं, कि अपनी मृत्यु की 1 दिन पहले बिस्तर पर पड़े हुए इंस्टिट्यूट के काम के बारे में जानकारी लेने के लिए उन्होंने अपने इंस्टिट्यूट मैनेजमेंट से मीटिंग रखी। 

नवंबर 1970 को 82 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। मगर, विज्ञान के क्षेत्र में उनके द्वारा दिए गए योगदान को हमेशा याद किया जाता रहेगा।

निम्नलिखित उनकी लिखीं हुई कुछ वैज्ञानिक किताबों के नाम दिए गए हैं :-

1. मॉलिक्युलर डिफ्रेक्शन ऑफ़ लाइट (1922)

2. रमन - स्कैटरिंग ऑफ़ लाइट

3. द न्यू फिजिक्स (1951)

4. वाई द स्काई इज़ ब्लू : डॉ. सी.वी. रमन टॉक्स...

5. ऑन द मैकेनिकल थ्योरी ऑफ वाइब्रेशंस...(1918)

6. एकॉस्टिकल मेमोयर्स (1912)

7. साइंटिफिक पेपर ऑफ सी.वी. रमन

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