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छोटी दीपावली : पांच भगवानों की पूजा करने का विधान

Kavishala DailyKavishala Daily November 3, 2021
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जैसे कि हम लोग दिवाली को एक दिन का त्यौहार नहीं, बल्कि पांच दिन का महाउत्सव बोलते हैं। जो कि, कार्तिक महीने की कृष्ण त्रयोदशी से शुरू होकर शुक्ल दूज तक चलता है। 

पहला दिन धनतेरस का मनाया जाता है। दूसरे दिन नरक चतुर्दशी, तीसरे दिन महा दीपावली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और पांचवें दिन भैया दूज का त्यौहार मनाया जाता है। आज हम दूसरे दिन, नरक चतुर्दशी के बारे में बताना चाहते हैं।

नरक चतुर्दशी को रूप चौदस/काली चौदस भी कहते हैं। इस दिन यमराज जी, काली माता, शिव जी, हनुमान जी, वामन जी की पूजा करते हैं। यमराज जी की पूजा इसलिए की जाती है ताकि अकाल मृत्यु ना हो। काली माता की पूजा की जाती है ताकि हमारे जीवन के सभी दुखों का अंत हो जाए। शिवजी की पूजा पार्वती माता को खुश करने के लिए करते हैं। हनुमान पूजा इसलिए करते हैं कि ऐसा माना जाता है कि इस दिन हनुमान जयंती भी होती है और संकट मोचन हनुमान हमारे सारे संकट को दूर कर दे। वामन जी की पूजा दक्षिण भारत में प्रचलित है। माना जाता है कि इस दिन राजा बली को भगवान विष्णु ने वामन अवतार में हर साल उनके यहां पहुंचने का आशीर्वाद दिया था। 

नरक चतुर्दशी की कथा :-

पौराणिक कथा के अनुसार, आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण, सत्यभामा और काली मां ने अत्याचारी और दुराचारी असुर नरकासुर का वध किया था और 16,100 कन्याओं को नरकासुर के बंदी ग्रह से मुक्त कराकर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। 

इस दिन एक और कथा भी है कि - रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो। आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। यह सुनकर यमदूत ने कहा हे राजन एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था। यह उसी पापकर्म का फल है। इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष का समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचें और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा। तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।

नरक चतुर्दशी के दिन शाम को चौखट और नाली के पास दीपक जलाकर खील-बताशे रखनी चाहिए। नरक चतुर्दशी की शाम को यह सब विधि-विधान करना जरूरी माना गया है और पूजा करते वक्त नरक चतुर्दशी के लिए मंत्र किया जाता है।

दीपक को जलाते समय निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए :-

ऊं यमाय नम:

ऊं धर्मराजाय नम:

ऊं मृत्यवे नम:

ऊं अन्तकाय नम:

ऊं वैवस्वताय नम:

ऊं कालाय नम:

ऊं सर्वभूतक्षयाय नम:

ऊं औदुम्बराय नम:

ऊं दध्राय नम:

ऊं नीलाय नम:

ऊं परमेष्ठिने नम:

ऊं वृकोदराय नम:

ऊं चित्राय नम:

ऊं चित्रगुप्ताय नम:

— नरक चतुर्दशी मंत्र

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