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छठ पूजा : सूर्य की आराधना का पर्व

Kavishala DailyKavishala Daily November 10, 2021
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छठ क आज हैं पावन त्यौहार

सूरज की लाली, माँ का हैं उपवास

जल्दी से आओ अब करो न विचार

छठ पूजा का खाने तुम प्रसाद

छठ पूजा की शुभकामनाएँ

सूर्य पूजा का संदर्भ :-

छठ पर्व पर खासकर सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।

सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है।

छठ व्रत के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं; उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को उनका राजपाट वापस मिला। लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी।

एक और कथा के अनुसार, प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। कहा जाता हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया।

छठ पूजा विधि :-

- छठ पर्व के दिन प्रात:काल स्नानादि के बाद संकल्प लिया जाता है। संकल्प लेते समय इस मन्त्र का उच्चारण किया जाता है,

- ॐ अद्य अमुक गोत्रो अमुक नामाहं मम सर्व

पापनक्षयपूर्वक शरीरारोग्यार्थ श्री

सूर्यनारायणदेवप्रसन्नार्थ श्री सूर्यषष्ठीव्रत करिष्ये।

- पूरे दिन निराहार और निर्जला व्रत रखा जाता है। फिर शाम के समय नदी या तालाब में जाकर स्नान किया जाता है और सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है।


लोकपर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति-भाव से पूर्ण लोकगीत गाये जाते हैं।

निम्नलिखित गीत छठ पर्व पर गाए जाते हैं :-

1. 'केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय

2. काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए'

3. सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार।

4. उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर।

5. निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे।

6. चार कोना के पोखरवा

7. हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।

प्रस्तुत है उपर दिए गए गीतों में से कुछ गीतो की पंक्तियां :-

(i)

केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेड़राय

उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से सुगा देले जुठियाए

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरछाये

उ जे सुगनी जे रोये ले वियोग से आदित होइ ना सहाय देव होइ ना सहाय।

(ii)

काँच ही बाँस के बहँगिया, 

बहँगी लचकति जाए... 

बहँगी लचकति जाए... 

बात जे पुछेले बटोहिया 

बहँगी केकरा के जाए? 

बहँगी केकरा के जाए? 

तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, 

बहँगी छठी माई के जाए... 

बहँगी छठी माई के जाए... 

काँच ही बाँस के बहँगिया, 

बहँगी लचकति जाए... 

बहँगी लचकति जाए...

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