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मनाएं अनोखी दीपावाली : कविताओं के संग

Kavishala DailyKavishala Daily November 4, 2021
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14 वर्षों का वनवास खत्म करके व रावण का वध करने के बाद श्रीराम जी वापस अपने घर लौटे थे। इसलिए उनके आने की खुशी में अयोध्या वासियों ने अपने घर को सुंदर दीयों से सजाकर पहली बार दीपावली मनाई थी । 

ज्यादातर लोग दीपावली का त्यौहार लक्ष्मी माता को खुश करने के लिए मनाते हैं। हमारे हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि मां लक्ष्मी धन की देवी है और वही धन और समृद्धि की दाता भी हैं। इसलिए लोग अपने घर में धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए दीपावली के अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। मां लक्ष्मी जी की पूजा भगवान गणेश के साथ की जाती है क्योंकि गणेश जी सुख समृद्धि के दाता हैं। इन दोनों की एक साथ पूजा करने से घर में धन और सुख का कभी अभाव नहीं होता है।

इस महाउत्सव के उपलक्ष्य में प्रस्तुत है कुछ दिवाली पर कविताएं :-

(i) "जगमग जगमग"

हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,

नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,

कैसी उजियाली है पग-पग,

जगमग जगमग जगमग जगमग!

छज्जों में, छत में, आले में,

तुलसी के नन्हें थाले में,

यह कौन रहा है दृग को ठग,

जगमग जगमग जगमग जगमग!

पर्वत में, नदियों, नहरों में,

प्यारी प्यारी सी लहरों में,

तैरते दीप कैसे भग-भग,

जगमग जगमग जगमग जगमग!

राजा के घर, कंगले के घर,

हैं वही दीप सुंदर सुंदर!,

दीवाली की श्री है पग-पग,

जगमग जगमग जगमग जगमग

— सोहनलाल द्विवेदी

व्याख्या : इसमें कवि कहता है कि, हर घर-दर, बाहर-भीतर, नीचे-ऊपर, हर जगह सुघर है। उजियाला पग-पग है। जगमग-जगमग हो रहा है। छज्जों, छत, आलो, तुलसी के नन्हे थालियों में जगमग दीपक अंधेरे को ठग रहा है। पर्वतों, नदियों, नहरों की लहरों में तैरते हुए दीपक जगमग-जगमग लग रहे हैं। राजा-रंक के हो घर, दीपक हर घर में चल रहे हैं और कदम-कदम पर जगमग करते हुए दीपक दिवाली का सौंदर्य है।

(ii) "दिवाली का दीपक"

दिवाली का दीपक मौन नहीं

अपने उजियारे से कुछ बोल रहा

जानो अंग अंग इसका आपके लिए

राज उज्ज्जवलता के खोल रहा

दिवाली के दीये लौ कहे

जलो ऐसे की दे सको उजियारा

तुम हो आशाओं की लौ

दूर करो जहाँ का अँधियारा

कहे दीये का तेल

अपना सब कुछ न्योछावर कर दो

यों खुद के लिए जीना अच्छा नहीं

अपनों खातिर जान हथेली पर रख दो

बाती बोले सहन कर पीड़ायें अपारजीवन का होये उद्धार

जब बनेगा तेरा तन मन शोला

धमक उठेगा यह संसार

अब कुम्हार का अड्डा कहे

खुद को तुम समृद्ध बनाओ

और दूसरों को देने को खुशियां

इस को तुम जहाँ में लुटाओ

तो यह दीपक के मन का गीत

जन्म से उजियारे की चलाये रीत

इस रीत में ख़ुशी का है संगीतऔर छिपी है इसमें मानव की जीत

— लोकेश इंदौर

व्याख्या : दीपावली के दीपक की अपनी अनूठी कहानी है। दीये के चार भाग होते हैं। जो चहुंओर से मानव को प्रेरणा देते हैं। दीये की बाती, लौ, तेल और स्वयं दीये का अपना अलग ही सन्देश इस कविता के माध्यम से प्रस्तुत है। यह कविता बताती है कि लौ सतत जलते हुए संसार को उजियारा देने की प्रेरणा देती है अर्थात अपने कर्म के माध्यम से संसार को अलौकिक करने का सन्देश देती है। वही बाती खुद जलकर जहाँ में ख़ुशी फैलाने का तो तेल खुद को समाप्त कर अपना धर्म निभाने का। वह मिटटी का दीया समृद्ध बनकर लुटाने एक सन्देश देता है।

(iii) "साथी, घर-घर आज दिवाली!"

फैल गयी दीपों की माला

मंदिर-मंदिर में उजियाला,

किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली!

साथी, घर-घर आज दिवाली!

हास उमंग हृदय में भर-भर

घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर,

किंतु हमारे घर के अंदर डरा हुआ सूनापन खाली!

साथी, घर-घर आज दिवाली!

आँख हमारी नभ-मंडल पर,

वही हमारा नीलम का घर,

दीप मालिका मना रही है रात हमारी तारोंवाली!

साथी, घर-घर आज दिवाली!

– हरिवंशराय बच्चन

व्याख्या : इसमें कवि अपने घर के सूनेपन पर, अंधेरे, गरीबी की व्यथा, बताते हुए कहते हैं कि दीपों की माला हर घर में सज गई है। मंदिरों में उजाला फैल गया है। पर मेरे घर में अंधेरे की कालिमा फैली हुई है। हर तरफ हंसी-उमंग दिलों में भरे हुए हैं। पर हमारे घर में सूनापन है। आकाश में तारों से भरी मालाएं हैं। यही हमारे लिए अब दिवाली है।

(iv) "सास, बहु और उनकी दीवाली"

सास ने बहू से कहा - 

'शादी के बाद यह तेरी पहली दीपावली है।

तेरे मायके से मिठाई आयेगी 

बोल देना बाप से असली घी की मिठाई भेजे 

वरना नहीं मिलेंगे जलाने को पटाखे 

मेरे तानों में तुम्हें बम जैसी आवाज पायेगी।'

बहू ने कहा - 'आप इंतजार मत करो 

ताने देने का पहले ही अभ्यास कर लो 

मिठाई तो आयेगी, 

पर असली घी कि होगी नकली की

इसकी गारंटी कहां मिल सकती है 

घी असली हुआ तो खोआ 

नकली हो सकता है

दोनों ही असली हुए तो भी 

आपको उनकी कीमत कम नजर आयेगी 

वह ठीक लगी तो रंग में कमी नजर आयेगी 

सब ठीक हुआ तो भी आप सास हैं 

इस मिलावटी युग में 

एक क्या ढेर सारी कमी नजर आयेगी।।

व्याख्या : यहां पर हास्य व्यंग करते हुए समाज में मिलावटखोरी, नकली माल बनाने पर कटाक्ष करते हुए कवि कहते हैं कि, सास बहू को बोलती है कि - मायके से असली घी की मिठाई भेजें नहीं तो, मेरे तानो में तुम्हें बम जैसी आवाज आएगी। तब बहु कहती है कि - सासू मां, आप ताने मारने का अभ्यास कर लो। क्योंकि मिठाई तो आएगी परंतु, वह असली होगी या नकली इसकी गारंटी नहीं है। असली लगेगी के कीमत कम लगेगी नहीं तो, रंग अच्छा नहीं लगेगा। नहीं तो स्वाद अच्छा नहीं लगेगा। सब ठीक भी हुआ तो इस मिलावटी युग में आपको सासू मां ढेर सारी कमी ही नजर आएगी।

(v) "दिवाली रोज मनाएं"

दिवाली रोज मनाएं

फूलझड़ी फूल बिखेरेचकरी चक्कर खाए

अनार उछला आसमान तक

रस्सी-बम धमकाए

सांप की गोली हो गई लम्बी

रेल धागे पर दौड़ लगाएआग लगाओ रॉकेट को तो

वो दुनिया नाप आए

टिकड़ी के संग छोटे-मोटेबम बच्चों को भाए

ऐसा लगता है दिवाली

हम तुम रोज मनाएं।

– संदीप फाफरिया 'सृजन'

व्याख्या : इसमें कवि बच्चों के मन को भाने वाले पटाखों के बारे में बताते हुए कहता है, कि हर रोज दिवाली मनाए। पटाखों में जान डालते हुए कवि कहता है कि - फुलझड़ी फूल बिखेर रही है। चकरी को चक्कर आ रहे हैं। अनार उछल के आसमान में गया। रस्सीबम धमका रही है। सांप की गोली लंबी हो गई है। रॉकेट को आग लगाओ तो, पूरी दुनिया नाप आता है। टिकडी जैसे छोटे-मोटे बम बच्चों को भाते हैं। ऐसा लगता है कि हम तुम रोज दिवाली मनाते हैं।

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