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।। अंधेरों की ओट मे ।।

kavimay12345kavimay12345 May 11, 2022
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अंधेरों की ओट मे
उजालों की पोटली
दबे एक संदूक से
सूराख अपनी खोजती

न दर्द का सवाल है
न मर्म का हिसाब है
जरूरतों के रात मे
सुबह बेमिसाल है

रोकने से रुकती नही
टोकने की आदत नही
निःशब्द हूँ ...
अगाध मे
निरस मेरे अब शब्द है

मोह के विरक्त की
टूटती वो हर घड़ी
जो सूर्य के प्रमाण पर
विश्वास से मुँह मोड़ती

सत्य भ्रम के छाँव मे
असत्य मन के गाँव मे
विवेक हर रहा उन्हीं का
जिनका अंश स्नेह सार है

जन्म के अनन्त से
करुण राग रंग से
संदर्भ और प्रसंग मे
प्रारब्ध मूल अंत है

क्षितिज आस मे रहा
सूर्य पास मे रहा,
पर,
न चाँद रात मे रहा
न रात चाँद मे रहा...।।




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