दूर रहने दो।'s image
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सफर का तालुक था कभी,
सफर से मोहब्बत थी कभी।
बदले थे शहर आहिस्ता आहिस्ता,
उनकी खबर थी मुझे।
रात दिन कुछ जुमनाम रहने लगा,
उसके दिल में सुबहों शाम रहने लगा।
मिली कसमाकस वेबाफाई में,
में उस शहर से दूर रहने लगा।
तस्वीर अब भी देखता हूं,
तकदीर अब भी देखता हूं।
वो खामोश हो गए हमसे होकर दूर,
हम उनकी तकलीफ ले जिंदा रहने लगे।
उस बेवफा की याद में जलने लगे,
लोगो के बीच भी तनहा रहने लगे।
अब याद भी सताती है शरद मौसम की तरह,
लगने लगते है ठंड उसके आंचल की तरह।
अब दूर रहने दो पथिक को,
और याद न किया करो
जा चुके हो दूर फरियाद न किया करो,
मैं जी लूंगा तेरे बगैर ए शाकी।
मुझे थोड़ा और मजगुर ही रहने दिया करो,
तुमसे दूर ही रहने दिया करो।

कवि अमन कुमार शर्मा
हिंदी विभाग सदस्य भागलपुर विश्वविद्यालय,
हिंदी विभाग सदस्य बिहार सरकार।
मोबाइल 7295977808

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