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रात आँखों में जब नींदें नहीं आई

kaushal kumar joshikaushal kumar joshi August 3, 2022
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रात आँखों में फिर नींदें नहीं आई

कुछ ख़याल थे जो ख़्वाब बनने की ज़िद में थे,

बड़ी कश्मकश में थी सब दीवारें,

के जैसे नींद मेरी आँखों से उतर कर इनमें समा जाएगी,


पर ना तो जल्दी मुझे थी ना नींद को,

तो फिर वहीं उस जगह चल दिए मैं और मेरे ख़याल,

इस बार हमने पहले से ज़्यादा बातें की,

और पिछली बार की तरह इस बार भी,

जब तुमने मुझसे मेरी कापी माँगी थी,

मैंने बातों ही बातों में कुछ इशारे करने की कोशिश की,

पर बुरा हो इस मासूमियत का,

तुमने समझने से साफ़ इनकार कर दिया,

और मैं मुरझाए दिल को दिलासा देता हुआ,

वापस मेरे कमरे में आ गया,

नींदें तलाशने की झूठी कोशिश करने,


ख़ैर!.. नींदें आज ज़रा ख़फ़ा सी थी ,

या फिर शायद इम्तिहान ले रहीं थी मेरा,


उस पर दिल में वो कुलबुलाते ख़याल,

किसी ज़िद्दी बच्चे के जैसे मुँह फुलाने लगे,

ज़िद थी कि ये ना सही

किसी और ख़्वाब में ही ढल जाएँ,

मैं तो थक चुका था इसलिए हार गया,

इस बावत इस बार हम उस बाग़ में थे,

जहाँ कुछ वक़्त बाद फिरसे देखा था तुम्हें,


इस बार ख़यालों ने फिर एक ज़िद की,

कहते थे इस अधूरे मंज़र को पूरा करेंगे,

तो फिर बात कुछ यूँ आगे बढ़ी,

मुसलसल इंतज़ार के बाद तुम आ ही गयी,

मैंने छुपी निगाह से तुम्हें देख भी लिया था,

पर जताया नहीं,

और फिर जब तुम मेरे बग़ल से गुज़री,

तो मैने मुस्करा कर के तुम्हें देखा,

जवाब में तुमसे वो तल्खियाँ नसीब हुई,

पर ज़रा सी देर बाद एक टुक़ मुस्करा कर तुमने,

मेरे ख़यालों की परवाज़ को और ऊँचा कर दिया,


इस तरह से एक छोटा सा ख़याल ख़्वाब में तब्दील हुआ,

और मैं गहरी साँस भरता हुआ,

फिर से मेरे कमरे में आ गया,


पर नींदें तो शायद आज इरादा कर के बैठीं थी,

या ख़यालों की ज़िद से दब कर,

मुमकिन है कहीं दुबक गयी होंगीं!


इससे पहले कि मैं समझ पाता कुछ,

ख़यालों ने कुछ और ही मंज़र बना डाला,


अब के हम एक अजीब सी ज़गह थे,

सुबह की हल्की हल्की धूप खिली थी,

बाँहें हिला कर पेड़ रुक रुक कर पंखा झलते थे,

हवाएँ कुछ ख़ुश्क और सर्द भी थी,

शायद सर्दियों की सुबह रही होगी,

फूलों ने आस पास बहुत सारी बस्तियाँ बसा रखी थी,

कुछ एक फ़ूल हवा के लहज़े में

अपना लहज़ा मिलाकर झूमते थे,

जैसे कि नन्हें बच्चे कोई गीत गाते हुए,

एक ही अन्दाज़ में झूमा करते हैं,

गुलों की इन ख़ुशहाल बस्तियों के बीच,

किसी की मीठी सी हँसी सुनाई पड़ती थी

मुमकिन है ये तुम्हारी ही हँसी होगी

जमीं को कुछ हल्की बढ़ी हुई हरी घास ने ढक रखा था,

और घास को दूर तक फैली ओस की चादर ने,

इस चादर के बावजूद भी,

घास एक क़तार में साफ़ हरी दिखती थी,

जैसे लगातार आने जाने से एक रस्ता बना हो,

ये रस्ता एक घर तक जाकर लौट आता था,

ये हमारा घर था,

दस्तक दिए जाने पर तुम दिखती हो,

तल्ख़ नज़रों ने कुछ पल मुझे घूरती हो,

नज़र-अन्दाज़ करने की झूठी कोशिशों के बाद,

मेरे पास आकर कुछ कहते-कहते,

ख़ुद को रोक लेती हो,

और फिर मेरे पहल करने से पहले ही

मेरे हाथों से वो दूध का डिब्बा लेकर,

रसोई की तरफ़ रुख़ करती हो,

तल्खियों की शिद्दत से मुझे अहसास हुआ,

लगता है आज मैं फिर देरी से लौटा था,

मैं देर से लौटने का बहाना ढूँढ ही रहा था कि,


यकायक मुझे मेरे हाथ ख़ाली लगने लगे,

एक हवा के झोंके में मुझे कुछ पीछे कर दिया,

इस झोंके के साथ हवाओं की रफ़्तार बढ़ने लगी,

और कुछ देर बाद कम होकर फिर ख़त्म हो गयी,

मैं वापस अपने घर की तरफ़ बढ़ ही रहा था कि,

घर की दीवारें अपनी रंगत खोने लगी,

खिड़कियों पर मनहूश घास उग आई,

ज़ीनों पे रखे गमले सूख कर वीरान हो गए,

दरख़्तों की सूरत और ढाँचे बदसूरत से दिखने लगे,

कुछ पेड़ों की पत्तियाँ सूख कर भूरी हो गयी,

और फिर शाख़ों से जुदा हो गयी,

सूरज की तपिश में इज़ाफ़ा होने लगा,

लगातार बढ़ती इस तपिश की वजह से,

ओस में लिपटी घास रेत के दरिया में बदलने लगी

एक चहकता मंज़र दश्त-ए-खिज़ाँ में तब्दील हो गया,

यकायक होते इन बदलावों से मैं सिहर गया,

मदद उम्मीद में ख़यालों को ढूँढने लगा,

पर लगता है ख़याल पहले ही जा चुके थे,


और मैं सज़ा से बचकर भागते मुजरिम की तरह,

घबरा कर वापस मेरे कमरे में लौट आया,

पर यहाँ भी ख़लिश के लहजे में कुछ आवाज़ें,

मुझ पर चोट सी करने लगी थी,

किसी चुभती आवाज़ का कहना था,

ये हक़ीक़त थी,

ये हक़ीक़त थी के जिसने ख़यालों के पर कुतर दिए,

और छोड़ दिया अफ़सोस की सख़्त ज़मीं पर,

गिर के टूट कर बिखर जाने के लिए,

ये हक़ीक़त थी जिसे रश्क़ था ख़यालों की तरक़्क़ी से,

ये हक़ीक़त थी जो नर्म काँच के ख़यालों को

छू कर तोड़ देना चाहती थी,


इससे पहले कि मैं भी हक़ीक़त की छुअन से

टूट कर बिखर जाता,

नींदों ने मेरी बेक़सी पे तरस खाकर,

मेरी आँखों में उतरने का फ़ैसला किया,

तो नींदें धीरे से आँखों में उतरने लगी,

और ख़याल किसी सज़ाआफ़्त बच्चे के जैसे,

कमरे के कोने में अब तक सहम रहे थे,


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