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एक तुम हो कि जाती ही नहीं

kaushal kumar joshikaushal kumar joshi August 4, 2022
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एक अरसे से ना देखा, ना पूछा,

ना ही कोई बात, ना ही मुलाक़ात,

पर तुम हो कि जाती ही नहीं



यूँ तो उस रोज़ भी कुछ ना था

जैसे तब था अब भी वो ही है,

मेरे सपनों में आयी है कुछ कमी

कितने बदल गए है ना अब हालात!


पर तुम हो कि जाती ही नहीं


उदासी अब भी घेर लेती है कभी,

मैं मुकर जाता हूँ कि वजह तुम हो,

मैं हर दम हारता हूँ फिर भी लड़ता हूँ,

मेरे हिस्से में सिर्फ़ ख़ालीपन, ख़ाली हाथ,


पर तुम हो कि जाती ही नहीं


तीरगी ही नज़र आती है दूर तलक,

पर उजालों की उम्मीद फिर से होती है,

क्यूँ ख़्वाबों में हँस के रोज़ चले आते हो,

इतनी बेदिली करके भी सिर्फ़ मेरे साथ


एक तुम हो कि जाती ही नहीं

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