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सिर्फ ढकोसलों को देखा हैं..

kashish..kashish.. February 18, 2022
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मैंने आज की पीढ़ियों को भी

रूढ़ियों की बुनियादों पर

पूर्वाग्रही हंसी हंसते देखा हैं।

मैंने आधुनिकता के भ्रम को

एकपल में टूटते देखा हैं

उसके खोखले अर्थ में ,

लोगों को उलझते देखा हैं।

मैंने स्मार्टफोन वाले लोगों को भी,

काला गौरा करते देखा हैं 

समर्थन रंगभेद का करते देखा हैं।

मैंने सेल्फी वाले चेहरों को भी,

ग़रीबी पर हंसते देखा हैं।

अंहकार को आधुनिकता का

 रूप धरते देखा हैं ।

मैंने प्योरिफायर वालो को भी,

भेद पानी पिलाने में करते देखा

जड़ों को जातिवाद की,

गहरा करते देखा हैं ।

मैंने पार्टीवियर साड़ियों में भी

नारी को पीछे देखा हैं

इलेक्ट्रॉनिक गैजेट वालों को भी,

चूल्हे चौके तक सीमित

नसीहतें देते देखा हैं ।

मैंने लेटेस्ट गैम्स वालों को भी

कद काठी पर हंसते देखा हैंं।

मैंने आधुनिकता के नाम पर

सिर्फ ढकोसलों को देखा हैं।




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