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फिर तमाशा जंग है,

Karmendra ShivKarmendra Shiv February 28, 2022
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आदमी की सोच, कितनी तंग है,
अपने ना हों, फिर तमाशा जंग है।

उजड़ते घर, बिखरते उस मुल्क में,
रंग सारे, हो रहे बदरंग है।

ये सियासत है, यहां किसका पता,
कौन जाने, कौन किसके संग है।

मुस्कुराते हैं, तबाही पर मेरी,
इश्क़ में, उनके भी अपने ढंग हैं।

~कर्मेंद्र

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