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Peace PoetryPoetry1 min read

खून बहा सरहद पर

Kapileshwar singhKapileshwar singh April 28, 2022
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खून बहा सरहद पर

सिर्फ और सिर्फ शहादद देखी

जो बहा गलियारो में

तेरी पूजा मेरी इबादत देखी

एक ही गुलाब की पत्तीयाँ

गुजरी जब बाजारो से

कुछ चडी मेरी अज़ान पर कुछ तेरी पूजा में

अगर उसे प्यारा नहीं था मेरा तेरा अलग होना

तो क्यू ही खिला वो कली से निकलकर 

क्या उसने अलग अलग अर्पित होने की नहीं आहट देखीं

क्या महकते फूलो ने भी खुदको भुलाकर

राजनीति की कभी चाहत देखी

खून बहा सरहद पर

सिर्फ और सिर्फ शहादद देखी

जो बहा गलियारो में

तेरी पूजा मेरी इबादत देखी

जो बहा गलियारो में

तेरी पूजा मेरी इबादत देखी।



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