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विज्ञापन की तारीफ़े- कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan July 19, 2022
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विज्ञापन की तारीफ़े

नैतिक हो या कि अनैतिक
दोहराए न जाने पर
समय के साथ कमज़ोर हो जाती हैं।
मानसिक क़रार के बावजूद
विस्मृत हो जाती है।


क़िस्से होते हैं सिर्फ़ ज़ेहन के
सफ़र होते हैं सिर्फ़ धड़कन के
दुनिया को साहस देकर
योग-संयोग की सड़क पर
गतिमान रहने को आते हैं।
कभी संगीत-कभी नृत्य की भाषा में
कविता का दरवाज़ा खटखटाते हैं।


क्योंकि,
कविता की आत्मा का ख़्याल
महज़ बाज़ार और महफ़िल के लिए नहीं होती हैं।
प्रागैतिहासिक काल से
इसकी हसरते सैलानी की भाँति
समय पर हस्ताक्षर करने को आती हैं।


जब दुविधा उत्तर तलाशती हैं तो
निर्झर बहती हुईं अजस्र रोशनी की
किरण को पास बुलाते हैं।
जब उसकी परछाँई पड़ती हैं तो
पलकें बिछाते हैं।


कालिख के सौंदर्यशास्त्र के
गीत गुनगुनाते हुए गुज़र जाते हैं।
पर निष्कलुष ईमान और धर्म को
रचकर सबक़ लेते हैं और 
प्रत्येक नृशंस पहेली को सुलझाते हैं।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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