वक़्त पर मरहम 
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वक़्त पर मरहम  -© कामिनी मोहन पाण्डेय।

Kamini MohanKamini Mohan March 21, 2022
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वक़्त पर मरहम 
-© कामिनी मोहन पाण्डेय। 

वक़्त पर मरहम 
रूंधे गले से
काँपते शब्द लगा नहीं पाते हैं
गिरी हुई मनुष्यता में
नरसंहार के कृत्य 
धर्म के खोल में छुप जाते हैं। 

कब्ज़ा के लिए अलगाव का बीज बोता है
मौका मिले तो नस्लभेद का खेल खेलता है
जंगल में भी ऐसा नहीं होता 
क्योंकि जानवर पैंतरा नहीं बदलता है
लेकिन लोकतंत्र कहकर
अख़्तियार में है जिनके सत्ता 
वो चुप की चादर तान कर सोता है। 

फ़ाइल देखकर कहता हूँ
मौसम बदल सकता है
लेकिन 
मज़हब का पेट ख़ून से भरने की
नहीं बदल सकती मानसिकता 
क्योंकि देख रहा हूँ 
लम्बी फ़ेहरिस्त है
कविता को ख़ून में रंगने की 
बेघर हुए जो उनके दर्द को तमाशा कहने की। 

यह सब देख
भला कैसे ख़ुश हो सके वो
जिनके जेब में सत्ता का चाबुक था। 

और
बे-कसूर समझते हैं वो ख़ुद को 
जिनके हाथों में सरिया, राॅड, दराँती 
पैना आरी और चाकू था। 

बंदूक का घोड़ा मासूमों को 
कत्तई नहीं छोड़ता है
वह सिर्फ़ धर्म देखता है
जिस माथे पर धर्म चिह्न टीका लगा है 
वहाँ राॅड घुसेड़ता है। 

आदमी, आदमी नहीं रहता है
शांतिप्रिय कहकर ख़ुद को तौलता है
कविता को पढ़कर भी 
कुछ नहीं बोलता है। 

ऐसे में,
क्या करे?
वर्षों तक सिर्फ़ फ़ाइल बनाते रहे
प्रोजेक्ट पर प्रोजेक्ट सबमिट कर
सबको दिखाते रहे। 

बात सिर्फ़ इल्म की नहीं
बात सिर्फ़ फ़िल्म की नहीं
ज़ेहन में पहुँची कविता को 
आसानी से दफ़न कर जाते हैं
ढाढ़स भी देने से कुछ कतराते है
कविता को भी सोची-समझी रणनीति बताते हैं। 

ग़ज़ब है 
नंगापन देखकर भी अनदेखा कर जाते हैं
आतंकी आतताइयों को पालते-पोषते जाते हैं
सज़ा देने के लिए कानून की घुट्टी पिलाते हैं
और वे
ता-उम्र देश की रोटी खाकर तगड़े हुए जाते हैं। 

हास्यास्पद लगता है उन्हें 
हमारी व्यवस्थागत लाचारी 
ज़मीर बेचकर
पड़ोस प्रायोजित आतंक से हैं यारी
इल्ज़ाम धरकर उनपर
करते रहते हैं ज़हरीली गद्दारी।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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