तहक़ीक़ात करती ख़बरों के
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तहक़ीक़ात करती ख़बरों के - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan July 21, 2022
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जीवन में प्रवेश करते ही शुरु होती है तलाश
प्रेम, त्याग, बलिदान, समझौते, समस्याएँ और आशंकाओं के उत्तर की
लेकिन सब कविताएँ हैं सिफ़र की
जो कहीं किसी गिनती में नहीं गिनी जाती हैं।

रोज़ इत्मिनान से
अख़बार को बार-बार पढ़ने के बावजूद
अख़बार को मोड़कर रखते ही
ज़िंदा स्मृतियों को देखने लग जाते हैं
कहीं कुछ और महत्वपूर्ण के छूट जाने की बात
सोचने लग जाते हैं।

ज़्यादा से ज़्यादा अमानवीय दृश्य
जो ज़ेहन के काम नहीं आते हैं
उस ख़बर के ख़बरदार कहते जाने के बाद भी
अमानवीयता में ज़िंदा रह जाते हैं।

तहक़ीक़ात करती ख़बरों के
अक्षर घूमते रहते हैं
दुपहरी के फूल की तरह
खिलते और सांझ पहर से पहले
गुज़रते समय की बात हो जाते हैं।

फिर भी चमचमाती रोशनी में
कविता सच को थामे
अपने स्थान पर खड़ी रहती है
अवशेष की कोई चिंता नहीं करती
इको सिस्टम में घुल जाने को झड़ती रहती हैं।

सब जानते हैं
वर्तमान, भविष्य के अनुमान से अछूता है
सोच को बार-बार सोचकर छूता है
जीवन और मृत्यु के बारे में
अपराध जो नहीं किए
ख़ुद उस दण्डित भोग को भोगने के बारे में
क्यूँ भोग रहे भोगने के बारे में पूछता है।

ख़बर और अख़बार में फ़र्क़ ये हैं कि
जीवन रुपी अख़बार के सारे पृष्ठ भरते जा रहे हैं
अंतिम पृष्ठ आने से पहले तक
हम पूरी कविता को पृष्ठ पर जगह तक नहीं दे पाते हैं
और प्रत्येक पृष्ठ की
पूरी कविता को पढ़ भी नहीं पाते हैं।

इसलिए,
अख़बार के सारे पृष्ठों को उलटने के बाद
अपनी ईमानदारी पर शक करते हैं
कोई ख़बर छूट तो नहीं गई
फिर से पृष्ठ संख्या एक से पढ़ना शुरू करते हैं।

- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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