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"शायद"- कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan September 15, 2022
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हक़ है नदी को समंदर के पास
इच्छानुसार लौटने का
हक़ है सब व्रत तोड़कर
प्रेम को प्रेम के व्रत में रखने का
हक़ है रात होने पर चमकते प्रकाश को भी
थककर गहरी नींद में सो जाने का।

ऐसी नींद, जिसमें सपने भी सो गए हो
अर्ज़ियाँ पोटलियों में बंद हो गए हो
फ़ुरसत में चहलक़दमी रूक गए हो
ताज़गी के रंज-ओ-ग़म मिट गए हो
हक़दारों के चेहरे पर
क़हक़हे बरस गए हो
ख़ुशी के दस्तख़त छप गए हो
'शायद' लफ़्ज़ मिट गए हो।

माथे और चेहरे की झुर्रियों तक
क़मीज़ से कफ़न तक
काग़ज़ी तहक़ीक़ात का
कोई अवैध हक़ बाक़ी न रहे
सुगंध की सौंदर्य को ख़बर रहे
ख़ाक-धूल में हर रंज-ओ-ग़म रहे।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय 

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