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सब खोकर - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan August 28, 2022
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पहाड़-सा जीवन
आडिग रहने को तत्पर।
पानी से चोट खाकर
टूटता दूर तक जाता अक्सर।

थम न सके बादल
दो पलकों के कोर से
टपकी बूँदे पाकर।
कोशिश कोरे सफ़े पर
इन्द्रधनुष खिले
समय के पार जाकर।

जैसे हो फ़रमान
रंगों को थाम लेने की।
वहाँ जहॉं बरसते समय सूर्य
नहीं होता ज़रूरत थी
आकाशगंगा को समेट लेने की।

बहुआयामी प्रेम
जो एक ख़ास जगह पर
शून्य को देता है स्थान सब खोकर।
ज़िन्दा रहे प्रेम आख़िरी साँस के
बाद भी पहाड़ से विलग होकर।

-© कामिनी मोहन पाण्डेय।

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