रूके क्यों हो उठो आओ?
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रूके क्यों हो उठो आओ? -© कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan August 29, 2022
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मरूस्थल में चाँद आता है,
दुधिया रूप कण-कण पर लहराता है।
रात में झलकती जल-सी ढरकती,
सवेरा सब छिपाए नया रुप पाता है।

हम भी तुम भी तपकर सिरहाने रख लें,
चहुँओर फैलकर जो मेड़ बन जाता है।
गूँथे हैं जो हवाओं ने बिखरे नहीं,
उस प्रेम में सरल मन गुनगुनाता है।

जब रात का ओढ़े लिबास नया रूप धरते हैं 
उन्मत्त तमन्नाओं का फूल खिलकर मुस्कुराता है।
सँवरते हैं निखरते हैं अंधेरा छुप ही जाता है,
चलो उठो देखो नया सवेरा पास बुलाता है।

बात की बात सुनो और सुनाओ,
नहीं फिर होगी ऐसी मुलाकात देखकर जाओ।
राहें दिल की आवारा रुकती नहीं कहीं कभी,
मिली हो ज्यों कड़ी से कड़ी आओ देखकर जाओ।

रूके क्यों हो उठो आओ?
अंतरगुम्फित शब्द लय से लय मिलाता है।
यहाँ नहीं कुछ बात रूकने में,
तुम्हें दूर बहुत दूर कहकशाँ पास बुलाता है।

- © कामिनी मोहन पाण्डेय 

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