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क़तरा-क़तरा पिघला है - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan September 24, 2022
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क़तरा-क़तरा पिघला है चाँद अम्बर के हाथों में
प्रकृति में रस-रंग बिखरे हैं रात के सन्नाटों में।

चाँदी-सी चादर ओढ़े हैं तैरते-फिरते तारों ने
एक पहर बीता है काली-सी अंधियारों में।

भोर से पहले कोरे होंठों पर टपकती लाली है
रफ़्ता-रफ़्ता टूटा अंधियारा अम्बर की प्याली में।

सूरज के आने से पहले ओस छलकती जाती है
प्रेम की सरिता ख़ूब दमकती आँगन-आँगन में।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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