प्रेम की ख़ुराक
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प्रेम की ख़ुराक -© कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan August 10, 2022
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मरूस्थल के जीव-जंतुओं के लिए
ज़रूरी है गर्म रेत
उनके लिए इसमें
असमर्थता की कोई बात नहीं
यह अनुकूलता है।
घर कर लेता है जो स्वभाव में
कभी छूटता नहीं
फिर भी आत्मकेंद्रित के भीतर
जो भी पल रहा है
एकाकी दृष्टि लिए न देखना
प्रतिकूलता है।

नहीं है जटिल
नेक-अनेक को देखना।
आकाश से घिरा हृदय शरीर
असंख्य स्मृतियों के
अगणित वज़न को ढोते हुए देखता है।

अनायास ही सही प्रेम की ख़ुराक
गंध और स्वाद को ग्रहण करता है।
अंतहीन यात्रा में जीवन की
मरूस्थल पर पड़ी धूप को न चाहकर भी
जलते देखता है।

दर्द पैदा होने पर हर कोई
भरभराई आँखों से दवा को देखता है।
लम्बे अरसे के इंतज़ार में
आँखों का विचलित पानी 
हर क्षण को धुँधला देखता है।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय 

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