180. प्रेम की जमीन - कामिनी मोहन।'s image
Poetry1 min read

180. प्रेम की जमीन - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan October 11, 2022
Share0 Bookmarks 187 Reads2 Likes
वो वक़्त-सा जाकर भी मुझ तक लौटता रहा,
इस मोड़ से उस मोड़ तक बस देखता रहा।
न रुका न चला बस सोचता रहा,
अपने ही क़दमों को तुम तक पहुँचाता रहा।

पानी की तरह बहता जाता है सबकुछ,
चुपचाप क़दमों से राह निकलता रहा।
कभी तेज़-सी, कभी हल्की-सी हैं ज़िंदगी की लौ,
ख़बर चराग़ों की उपस्थिति तक दर्ज़ करता रहा।

अपनी उपस्थिति का ही फ़र्ज़ मुझ पर रहा,
खुली आँखों का कर्ज़ ख़्वाहिशों में दर्ज़ रहा।
आहट के परिक्षेत्र का ख़्वाब बेवजह है,
एक सिरे से दूसरे सिरे तक बस दस्तक देता रहा।

भयमुक्त बैठा शून्य मौन ढाँपकर देखता है,
दिल-ए-बे-क़रार तिनके-सा टूटता रहा।
प्रेम की जमीन तैयार करने को,
गणित के सब अंकों का हल ढूँढ़ता रहा।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय 

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts