पहर कोई भी हो
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पहर कोई भी हो - © कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan July 7, 2022
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पहर कोई भी हो
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

पहर कोई भी हो
विचार स्थिर नहीं हो रहे हैं
बिना सिर-पैर के भागे चले जा रहे हैं
तलवों में ऐंठन देह बदहवास है
पाँव के निशान फ़र्श पर छप रहे हैं।

उबाल से पहले बढ़ता रक्तचाप
बहता पसीना बेहिसाब
निर्झर धुल रहे सब संताप।

धूँ धूँ विचाराग्नि धधक रहीं
मन को उदिग्न कर रहीं।

सफ़र है पाक्षिक काग़ज़ पर
आधी रात की चंद्रमा के रंग
कविता के चरणों में रखकर
चुकता कर न सकेंगे मूल्य
श्रम से ख़रीदकर विचार-पुष्प
हाथ में लिए सोचते जा रहे हैं।

इतिहास में दर्ज़ होगी यात्रा
धरती के दीप-पुष्प की
काशी में स्नानकर
देह से पश्चाताप के
आँसू माँग रहे हैं।

सीमित है साँसे
लंबा है रास्ता
पृथ्वी के पथ
ढूँढ़ने का वास्ता
ख़ुद को दे रहे हैं।

समय से ही समय को माँगकर
कुछ समय के लिए
रुँधे गले को चुपचाप लिए
शर्ट की बटन से ढाँप रहे हैं।

आधा हो या कि पूरा जिसने बनाया
जिसने रंग और सुगंध साँसों में पहुँचाया
उसे याद कर सारे विचार
मन, बुद्धि और अहंकार संग
सब वापस करने की
केवल अधूरी इच्छा पालते रहे हैं।

सिद्धि के बड़े-बड़े हाथ लिए
प्रतीक्षा में खड़े रहकर
आ पहुँचे हैं शक्ति-द्वार
मौन ढाँपकर विचार के लिए
आशीर्वाद माँग रहे हैं।

बेसुध गतिमान
कोई गतिरोध कहीं से आए
रोक लें, नहीं तो
विचित्र विचार विनिमय से
प्रेम भंग हो रहे हैं।

- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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