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न तो अंतर्तम की ख़ूबसूरती को और न ही प्रेम को खरीदा जा सकता है - © कामिनी मोहन पाण्डेय।

Kamini MohanKamini Mohan April 27, 2022
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न तो अंतर्तम की ख़ूबसूरती को

और न ही प्रेम को

खरीदा जा सकता है

- © कामिनी मोहन पाण्डेय।


 की स्थिति को जानकर ही अंतःस्फूर्ति को जाना जा सकता है। हमारा ह्यदयाकाश बहुत ही असीम है। इसमें सम्पूर्ण सृष्टि समाहित है। इसे सदैव खोले रखना चाहिए। सदाशयता पूर्वक मन का इसमें प्रवेश होना चाहिए। क्योंकि यहाँ चाहत नहीं, कोई दुर्भावना नहीं, सांसारिक उद्योग और मानसिक भेद भी नहीं है। यह वास्तविक तौर पर हमारे भीतर में पनप रही महत्वाकांक्षाओं से प्रभावित भी नहीं है।

हमारे हृदय का आकाश दुनिया के वाह्य जगत के लिए नहीं है। यह दुनियावी पचड़े में पड़ा नहीं रहता। लेकिन यदि हम इसमें दुनिया भर की तमाम ऊल-जलूल चीज़ों और विचारों को भरते जाएँगे तो हमारा संपूर्ण जीवन संघर्ष से भर जाएगा, ऐसा संघर्ष जिसका अंतस् चेतना से कोई लेना देना नहीं है।

जिस प्रकार वाह्य जगत में कोई चीज़ सुंदर है तो उसके सुंदर लगने के पीछे प्रेम है। यदि प्रेम न हो तो सब कुछ केवल होना प्रतीत होगा, जिसका हम पर कोई प्रभाव नहीं होगा। प्रभाव के न होने के कारण कोई आनंद भी नहीं होगा।

वस्तुतः अहम के कारण व्यक्ति न तो जीवन को समझ पाता है और न तो जीवन की शक्ति को। व्यक्ति अपने होने और न होने को भी नहीं समझ पाता है। हमारा अहम हमेशा प्रशंसा चाहता है। वह नहीं चाहता कि कोई उसे अहम की कुर्सी से नीचे गिराए।

इस संदर्भ में संत कबीर की सत्य वाणी है -

प्रेम न खेतों नीपजै प्रेम न हाटि बिकाइ।

राजा परजा जिस रुचै, सिर दे सो ले जाई।।

प्रेम न खेतों में उत्पन्न होता है, न ही बाजारों में बिकता है। ऐसा भी नहीं कि इसे जो भी चाहे खरीद ले। राजा अथवा प्रजा जो भी प्रेम पाना चाहते हैं, उन्हें अपना सिर देकर यानी अहंकार का त्यागकर के ही प्रेम की प्राप्ति होती हैं। 

दरअसल, मनुष्य एक संवेदनशील प्राणी है। उसके विचार मनुष्यता के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं, लेकिन जब वह अपने अहम के कारण अलगाव से प्रभावित होता है तब उसके विचार उसकी चेतना के साथ तालमेल नहीं रख पाते हैं। व्यक्ति कितना भी प्रतिभावान हो कितना भी गुणी हो लेकिन वह अपनी प्रवृत्ति को संभाल नहीं पाता है। 

जब दिखावा का भाव वैयक्तिक होने के कारण बढ़ता जाता है तब प्रेम कोसों दूर चला जाता है । यह जिससे हमारा अहम् पुष्ट रहे, हमारी प्रशंसा होती रहे, सिर्फ़ उन्हीं बातों, उन्हीं चीज़ों को इकट्ठा करने के पीछे पूरी शक्ति लगा देता हैहृदय आकाश में बिना मतलब की चीज़ों को भर लेना प्रेम नहीं है। यह हमारे मन-मस्तिष्क का संवेदन शून्य होते जाने का परिणाम है। हमें यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि ऐसे सामानों से भरे हुए व्यक्ति के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है।

तो हम यह कह सकते हैं कि जो सांसारिकता में जकड़े हुए नहीं हैं। वे मन और अंतःकरण से तालमेल रख पाते हैं। उत्तेजनाओं और संवेदनाओं का उपयोग कर पाते हैं। उनका प्रेम हृदय के मुस्कान में, मन के मौन में अभिव्यक्त होता है।

प्रकृति के सौंदर्यात्मक मूल्य भी यही है। मछलियों को तैरते हुए देखना, पक्षियों को उड़ते हुए देखना, उनको चहचहाते हुए, आपस में बात करते हुए सुनना, नई कोंपलों को खिलते हुए देखना, गेंदा फूल को धीमे-धीमे विकसित होते देखना, बादलों को आते-जाते आकार बनाते दृश्यों को आत्मसात करना, मकड़ी को पेचीदा जाला बुनते हुए देखना। ये सब प्रकृति के प्रति संवेदनात्मक दृष्टि है। चारों ओर फैले प्रेम का प्रकटीकरण है।

बाहर के सौंदर्य को देखते-देखते अपने भीतर प्रेम का एक ख़ूबसूरत दृश्य विकसित हो जाता है। जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण का पता चल जाता है। अहम से परे चले जाना अनमोल जीवन की क़ीमत और शक्ति को पहचानना है। यह गौरवशाली जीवन का घनिष्ठतम सत्य के साथ सम्बन्ध स्थापित करना है।

छायाचित्र-कामिनीमोहन।

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