188 ."मिटता चित्र है"
-© कामिनी मोहन।'s image
Poetry1 min read

188 ."मिटता चित्र है" -© कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan October 23, 2022
Share0 Bookmarks 196 Reads1 Likes
आँखों में अविरल नेह लिए
एक दिन सारी घातें रीत गईं।
बस यही मेरा जीवन निर्वाह है क्या?
किरण-किरण से पूछ भईं।

भूले-भटके ही क्यूँ बस,
दो घड़ी स्निग्ध हृदय की शोभा है।
चारों तरफ़ आदिम निशान लिए,
क्या अपूर्ण कविता की शोभा है।

अंतर को जो प्रसन्न करे,
ऐसी चलती हवा नहीं।
भूले-भटके छाया मिल जाए,
ऐसा घनीभूत वन-कुंज नहीं।

कौन है जो अपना बना ले?
दुनिया के सिर से बोझ उठा ले।
दुनिया में रहकर दुनिया बसा ले,
खंडित प्रतिमाएँ गोद बिठा ले।

समय ने सब पलट दिया है,
सिद्धांत विहीन शत्रु-मित्र है।
समकालीन समय संसार में,
यथार्थ अर्थ का मिटता चित्र है।

- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts