कर्म करके चीज़ों की
दिलचस्पी को बनाएँ 
रखना ख़तरनाक

- © कामिनी मोहन पाण्डेय।'s image
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कर्म करके चीज़ों की दिलचस्पी को बनाएँ  रखना ख़तरनाक - © कामिनी मोहन पाण्डेय।

Kamini MohanKamini Mohan March 18, 2022
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कर्म करके चीज़ों की

दिलचस्पी को बनाएँ 

रखना ख़तरनाक

© कामिनी मोहन पाण्डेय।



र्म का कुछ न कुछ परिणाम अवश्य होता है। कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता है। निष्काम कर्म का उपदेश यही है कि फल की आशा छोड़कर कर्म किया जाए। मनुष्य की हालत यह है कि वह परिणाम की इच्छा के बग़ैर कोई कार्य कर नहीं पाता है। स्वाभाविक इच्छा तो अवश्यंभावी है और आवश्यक भी है। लेकिन निषेध उस आसक्ति का है, जिसके लोभ में कार्य प्रणाली के गुण-दोषों की ओर देख आँखे बंद हो जाती है।
शास्त्रोक्त वचनों में इसीलिए आया है कि उत्तमता प्राप्त करने का वैज्ञानिक तरीका अनासक्ति है। अनासक्त कर्म की उपासना करने वाला व्यक्ति सांसारिक पंचभौतिक वस्तुओं की नश्वरता को गंभीर दृष्टि से देखता है। उसे दिखता है कि सारे दृश्य पदार्थ गतिमान है, ये उत्पन्न होते हैं, बढ़ते हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान को चलते हैं और एक दिन विनष्ट हो जाते हैं।
नाशवान गतिशीलता में किसी को आज तो किसी को कल नष्ट होना है। नाशवान गतिशीलता को समझने वाला किसी को न तो अपना समझता है और न तो किसी को पराया। जो उपयोग के लिए मिलता है उसे अनासक्ति के साथ उपयोग करता है। कुछ खो जाय या नष्ट हो जाय तो उसके प्रति मन पर शोक के बादल को छाने नहीं देता है। उसे पता रहता है कि उत्पन्न होना और नष्ट होना सृष्टि क्रम का चक्र है। नित्य असंख्य जीव व मनुष्य जन्मते और मरते आ रहे हैं। फिर अपना यदि कोई प्रियजन चला जाय तो इसमें दुखी होने का कोई कारण नहीं बनता है। 
धन, यश, स्वास्थ्य सभी अस्थिर व डांवाडोल वस्तुएँ है। इनके लिए हाय तौबा मचाने से कोई लाभ नहीं है। मनुष्य के लिए हानि-लाभ के अलावा अपना कर्तव्य कर्म ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। उदाहरण के लिए सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के जीवन को देखे तो उनका अनासक्त कर्म उनके पूर्ण जीवन की अवस्था को दर्शाता है। उनका राज्य चला गया, स्त्री से बिछड़़ गए, पुत्र के मर जाने के बाद मरघट पर भी वे अपने कर्तव्यपथ पर अडिग रहते हैं। इसलिए हम यह समझ सकते हैं कि कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता है। अधिक और उत्तम फल प्राप्त करने का वैज्ञानिक तरीका अनासक्ति है। राजा हरिश्चंद्र के कर्म की कुशलता ही योग थी।
मनुष्य यदि अपनी दिलचस्पी को फल की उलझन से निकालकर कार्य प्रणाली में लगा दे तो उसकी हर समय आनंदमय हो सकता है। इसका आसान उपाय यह हो सकता है कि भविष्य के मंसूबे न बाँधते हुए वर्तमान में जीने की आदत डाल ली जाय। 
कर्तव्य कर्म रूपी धर्म भी यही सिखाता है कि वर्तमान में जो कार्य सामने हैं, उसे पूरी तैयारी और निष्ठा के साथ तुरंत कर लिया जाय। भविष्य के मंसूबों को छोड़कर वर्तमान में लगते ही शरीर की सारी ऊर्जा और शक्ति का सच्चे कर्म में उपयोग होने लगता है। अनासक्त कर्म को प्राप्त करने का यह उत्तम तरीका है।
इसीलिए, सांसारिक पंचभौतिक वस्तुओं की नश्वरता को गंभीर दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। इन सबका आध्यात्मिक लाभ यह है कि अंतस् चेतना सांसारिक विषयों में लिप्त नहीं होती है और जीव दुनियावी प्रपंच में नहीं पड़ता है। 
इस संसार में इच्छित आकांक्षाओं और मोह का आकर्षण है। मोह का आकर्षण यदि लंबे समय तक बना रहे तो यह गहरे संस्कार के रुप में असर दिखाते हैं। मनुष्य के ये संस्कार उससे चिपक जाते हैं और अगले जन्म की ओर चलायमान रहते हैं। आत्मोन्नति में यह भारी बाधक बनते हैं। इसलिए कर्म में अलिप्त रहने की व्यवस्था करनी चाहिए, कर्म करके उससे किसी भी चीज़ की प्राप्ति की दिलचस्पी को बनाएँ रखना ख़तरनाक है।
छायाचित्र-कामिनीमोहन।

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