एक टीस ही ऐसी होती है
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एक टीस ही ऐसी होती है - © कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan September 1, 2022
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एक टीस ही ऐसी होती है
जो अंतर में बस जाती है।
जब तक पूरा न हो
बाहर निकल न पाती है।

पहले-पहल एक गंध होती है
फिर अंतस् में घुल जाती है।
हृदय से आँखों में उतरकर
दृश्य बनकर रुक जाती है।

अतीत काफ़ी घटनामय दीखता है,
भविष्य मौन ही रहता है।
कुछ कह नहीं सकता हूँ
सतही ज़िंदगी सनसनी सोचता है।

नक़्शे अंधेरे के खींचता हूँ
ग़ैर-हाज़िर को हाज़िर करता हूँ।
आत्म-संवादी अपरिभाषित ही रहता है
बहुतेरी रेखाएँ पंक्तियों में रख छोड़ता हूँ।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय 

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