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दूर से गूँजती- Kamini Mohan

Kamini MohanKamini Mohan April 3, 2022
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दूर से गूँजती

Kamini Mohan 
दूर से गूँजती,
आती है आवाज़।
जैसे मँडराते तूफ़ान की,
हो कोई विचित्र साज़।

डर के घोंसले से पक्षी,
उड़ने की सोचता है।
तोड़-फोड़ के परिवर्तन से,
बचने की सोचता है।

यहाँ कौन किसकी सुनता है,
सब जैसे निर्निमेष रहता हैं।
आते हैं,जाते हैं, कुछ सुनते हैं,
पर चुप्पी इधर-उधर रहता हैं।

केवल प्रकाश, केवल अंधकार,
दोनों से नहीं किसी को इंकार।
व्याख्यान है, सबके अपने-अपने,
साथ जो सधता नहीं, रहता बेकार।

कैसे होती हैं साधना,
केवल देह समझता नहीं।
लीन होकर अपने विचारों को देखने पर भी
भावनाओं का चुनाव होता नहीं।

आपनी वास्तविकता के हम हैं निर्माता,
निर्माण में जो व्यर्थ है, उसका भी कुछ अवशेष है।
पर कविता कैसे बचे, बच कर कहाँ जाए,
जब यहाँ अर्थ और अनर्थ का द्वंद्व विशेष है।

- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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