दु:खालय का दुशाला - कामिनी मोहन।'s image
Poetry1 min read

दु:खालय का दुशाला - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan June 19, 2022
Share0 Bookmarks 7 Reads1 Likes
दीया बुझता है तो धुआँ उठता है

पर हमारे साथ हमारा रिश्ता जलता रहता है।

हमारे, तुम्हारे और उसके

हर बदलते रिश्ते के लिए

यादृच्छिक लहज़ा एक ही तरह की

चीज़ों का समूह निर्मित करता है।

फिर विसरित स्मृतियों को हठात

रचनात्मकता प्रदान करता है।

है यह कल्पना और सोच की

है यह अप्रतिम शक्ति मनुष्य की।

पर अनुभवजन्य अतीत से

मनुष्य कुछ छोड़ता

और कुछ पकड़ता है

अपनी ही शक्ति में उलझकर

दु:खालय का दुशाला ओढ़ता है।

-© कामिनी मोहन पाण्डेय।


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts