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दर्द ही दर्द है- कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan April 22, 2022
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दर्द ही दर्द है

दर्द    ही    दर्द    है,
कंक्रीट का जंगल है।
समंदर        समंदर
खारा     जल     है।

काँटा     चुभे     तो,
बदन  कुम्हलाता  है।
रोता  है  तड़पता  है,
चेहरा  ज़र्द होता  है।

घाव   के   छाले  हैं,
कुदरत   ने  पाले हैं।
ख़ुद  को   बदलकर,
नया   कर  डाले हैं।

रण  नहीं  छोड़ते हैं,
पीछे  नहीं  मुड़ते हैं।
जंगल से  गुज़रते हैं,
दर्द के पार  होते हैं।

चक्की   के   पाटों  से,
जो   भी   गुज़रता  है।
साबूत    बचकर  भला
कब कौन निकलता है।

-© कामिनी मोहन पाण्डेय

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