बरसे बग़ैर जो घटा आगे बढ़ी
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बरसे बग़ैर जो घटा आगे बढ़ी - © कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan July 23, 2022
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मौसम विभाग रुत के बदलने और
बरसने की सूचना दे रहा।
पर मेघों का घना समूह
बस एक के पीछे एक चलता जा रहा।

जैसे काग़ज़ पर लिखा हुआ
घटित होता नहीं
वैसे ही काले मेघ झूठे लगने लगते हैं, ऐसे जैसे
उमस में पसीने से तर-बतर कोई हो नहीं रहा।
जैसे सावन हो या कि भादो
बरसने का नाम नहीं ले रहा।

सावन सूखा रहे और
ख़ुद को बारिश में भीगा हुआ कह दे।
भादो और आषाढ़ तपता रहे और
सिर्फ़ नाम के कारण
सब अघटित को घटित कह दे।

नहीं, घनघोर घटा का स्वप्न में हमला
देह नहीं मन पर करता है घात।
उमस, गरमी और प्यास
हमेशा करते हैं आघात।

कविता जो सोचतीं
वह नहीं है आपस की बात।
सदियों से दबी वितृष्णाएँ
भावनाओं की छाँह में
करती हैं भावुक बरसात।

इसीलिए, मैंने इक रात में
बीते और आने वाले कल को
न तो दर्ज़ किया और
न तो फ़र्क़ किया।
प्रेरणा पाने को उद्धरण कई पढ़े
और कई लिखे
पर बरसे बग़ैर जो घटा आगे बढ़ी
व्यर्थ ही हवाओं संग यात्रा किया।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

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